हम सब भारतीय हैं

इसरो प्रमुख सिवन का तमिल चैनल में साक्षात्कार चल रहा था। इस दौरान एक सवाल के जबाब में इसरो प्रमुख का यह कहना कि वह भारतीय हैं, जिस तरह का स्वागत प्राप्त कर रहा है, इस  बात की गवाही है कि हमारे यहां क्षेत्रीय भावना कितनी हावी है और मीडिया का भी एक वर्ग नेताओं की तरह ही इसे भड़काने का हर संभव प्रयास करता है। दोनों का हेतु एक ही है एक का  टीआरपी बढ़ाना और दूसरे का अपना मत बढ़ाना। ये दोनों ऐसा करते समय यह भूल जाते हैं कि अपने-अपने स्वार्थों के लिए खेले जाने वाले ऐसे खेल ही अंतत: हमारी राष्ट्रीय भावना को मजबूत  होने में रोड़ा बनते हैं और हमारी उस पहचान को भी प्रभावित करते हैं, जो भारतीय है। उसे अग्रक्रम न मिलकर पहले हम तमिल उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, बंगाली, पंजाबी सब बन जाते  हैं, उसके बाद भारतीय बनतें हैं।  हमें समय-समय पर जरूरत पड़ती है सीवन जैसे उक्त बयान की यह एहसास कराने के लिए कि हमारा असली परिचय भारतीय है, जबकि यह पहले है और  बाकी सब बाद में। पिछले सत्तर साल की राजनीति और मीडिया इस भावना को वह परिपक्वता नहीं प्राप्त करा पाया, जिसकी जरूरत थी और यही कारण है कि आज भी क्षेत्रवाद का दंश कभी  भाषा के विरोध के रूप में, कभी  स्थानीय लोकाधिकार के रूप में हमारी राष्ट्रीयता को दंश मारता रहता है, जिसका प्रतिकार करना और राष्ट्रीयता की भावना मजबूत करना और अपनी राष्ट्रीय  पहचान को यानी भारतीयता को अग्रक्रम पर रखना हम सबका प्रथम कर्तव्य है। गुलदस्ते कई तरह के होते हैं। कुछ एक ही फूल के होते हैं, कुछ में रंग-रंग के फूल लगे होते हैं। एक रंग के फूल  के गुलदस्ते का अपना असर है।
 परंतु रंग-बिरंगा गुलदस्ता का असर ही अनूठा  होता है। हमारा देश भी इस तरह का गुलदस्ता है जिसमें उत्तर से दक्षिण तक, पूर्व से पश्चिम तक कई रंग हैं। परंतु जैसे अलग-अलग फूलों के  बाद भी गुलदस्ता गुलदस्ता ही होता है। उसके अलग-अलग फूलों से उसकी पहचान नहीं होती। वैसे ही बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश या कोई और राज्य भारत के अंग हैं, सब मिलकर भारत है।  जिसके हम वासी हैं और हम सब भारतवासी हैं। यदि आज भी यह बताने की जरूरत है कि हमारी पहचान क्या है और यह किसी भी राज्य से ऊपर है। इसका ध्यान सभी नेता सामाजिक  कार्यकर्ता और मीडिया रखेंगे, तो फिर जब कोई सिवन जैसा Žबयान आने के बाद उत्सव मनाने जैसा उत्साह नहीं दिखेगा। यदि ऐसा हो रहा है, तो कहीं न कहीं हमारे में ही कमी है और उसे दूर  करना होगा। देश में भाषा, खान-पान, पहनावे के स्तर पर विभिन्नता है। परंतु जब अंग्रेजी सीखने में किसी भी भाषा-भाषी को हिचक नही है। कोई भी नामचीन व्यक्तिअपने  बच्चों को हिंदी या
अन्य भाषाओं में नहीं पढ़ना चाहता है, तो उसे कोई अधिकार नहीं कि नेता के रूप में या अभिनेता के रूप्प में या मीडिया चलाने के लिए वह क्षेत्रवाद का जहर समाज में घोले या भाषा के नाम  पर लोगों में भेदभाव का बीजारोपण करे। सब सुखी हों सब आŽबाद हों। कारण ये सब भारत रूपी गुलदस्ते के विविध रंग हैं, परंतु ऐसा करते समय यदि इस भावना को चोट पहुंचती है, तो हमें  ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए। यह एक सुखद संयोग है कि पिछले लगभग छह साल से जो सरकार केंद्र में सत्तासीन है।
वह इस राह पर चल रही है भारत की आज एक नई धमक है, नई चमक है और राष्ट्र भावना की यह चमक उतरोत्तर बढ़ रही है। यह एक शुभ संकेत है। आइए हम सब मिलकर इस भावना  को और पुख्ता करें और अपने आचार-विचार और व्यवाहर से हर व्यक्ति को यह एहसास दिलाएं कि हम सब एक ही भारतीय परिवार के सदस्य हैं, भारतीय हैं।

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