डूबती नाव, भागते लोग

2014 के लोकसभा चुनाव से शुरू हुई कांग्रेस और राकांपा की खस्ता हालत दिनोदिन और खराब हो रही है। उसके बाद विधान सभा हारे और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी  वही हाल हुआ और अब जबकि विधान सभा चुनाव की दुंदुभी फिर बज रही है, दोनों दल सिर्फ एक बात की ही सुर्खियां बटोर रहे हैं और वह है एक के बाद एक उनके नेताओं का  उनकी पार्टी छोड़ भाजपा का या शिवसेना का दामन पकड़ना है। यह रफ्तार इतनी तेज और व्यापक है कि लगता है कि इन दोनों दलों में इने गिने ही नामचीन नेता बच पाएंगे। इसे  देखकर ऐसा लगता है कि पार्टी का राज्य या राष्ट्रीय नेतृत्व इन नेताओं और कार्यकर्ताओं में चुनाव जितवाने का भरोसा नहीं पैदा कर पा रहा है। मोदी युग में एक के बाद एक ऐसे  काम हो रहे हैं, ऐसे फैसले हो रहे हैं जिसको कांग्रेस ने लंबे समय से लंबित करके रखा था या उनसे दो-दो हाथ करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी इसके मद्देनजर कांग्रेस के  कार्यकर्ताओं को जवाब देना मुश्किल हो रहा है। उन्हें लग रहा है कि राकांपा-कांग्रेस में रहते उनका भविष्य नहीं है, इसलिए वह आंख कान मूदकर जहां संभव है, वहां भाजपा का  नहीं, तो शिवसेना का दामन पकड़ रहे हैं। कांग्रेस और राकांपा का करिश्माहीन नेतृत्व और गुटवाद और परिवारवाद भी आग में घी का काम कर रहा है और नेता एक-एक कर पार्टी  छोड़ रहे हैं। राकांपा अपने चरम उत्कर्ष काल में भी पूरे राज्य की पार्टी नहीं थी। विदर्भ में उसकी स्थिति कभी भी बहुत मजबूत नहीं थी। मुंबई में भी उसकी हालत खस्ता थी, वही  सूरतेहाल मराठवाडा का था थोड़ी बहुत ताकत कोकण में थी और बाकी पश्चिमी महराष्ट्र में, परंतु 2014 से लेकर अब तक वह भी करीब- करीब खत्म है और यही हाल एक जमाने  में राज्यव्यापी पार्टी कांग्रेस का है। उसके सारे मतबैंक हवा हो चुके हैं। आज पार्टी यह दावे के साथ नहीं कह सकती कि कौन उसका मुख्य मतदाता है, जबकि भाजपा उतरोत्तर उफान  पर है। उसने ऐसे फैसले मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के नेतृत्व में लिए है जिन पर कांग्रेस कब से बैठी थी। उदाहरण के लिए मराठा आरक्षण का जिक्र किया जा सकता है। इसी तरह  से चाहे सूखा हो या बाढ़ सबका सामना प्रभावी ढंग से मुख्यमंत्री ने किया है और चाहकर भी विपक्ष कोई चुनौती नहीं खड़ी कर पाया है। आज विपक्ष के पास न नेता हैं न नीति है  और न ही कोई एजेंडा। कारण हर मुद्दे पर अपने कार्य से उन्हें भाजपा नीत केंद्र और राज्य सरकार ने मूक बना दिया है और नेतृत्व ऐसा है, जो क्या करे वह यह नहीं सोच पा रहा   है। ऐसी स्थिति में भगदड़ नहीं होगी, तो क्या होगा। शरद पवार अपनी नाती को ही जबरिया चुनावी समर में उतारने से नहीं रोक पाए। ऐसी परिस्थिति ने कार्यकर्ताओं और नेताओं  में यह संदेश गया कि अब साहेब की उतनी नहीं चलती है। राजनीति में कोई साधु-संन्यासी बनने नहीं आता है। जब उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस-राकांपा में उनका भविष्य सुरक्षित  नहीं हैं, तो उनके लिए और सुरक्षित जगह खोधना लाजिमी है और वही हो रहा है। आज अजीत पवार खुद भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में हैं। इसके अलावा और कई नेता भी उसकी   चपेट में हैं और आघाड़ी की विजय की दूर- दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही है। ऐसे में भाजपा या शिवसेना का विजयी रथ ही वह आशा की किरण है, जिसमें लोग नहाना  चाहते हैं और वही हो रहा है वैसे भी जिस तरह राधाकृष्ण विखे पाटिल और अभी हर्ष वर्धन पाटिल गए। उसे लेकर कांग्रेस का एक वर्ग यह भी कह रहा है कि पवार साहेब ही कांग्रेस  को डूबो रहे हैं। कारण इन नेताओं की सीटें यदि राकांपा छोड़ देती, तो ऐसा माहौल नहीं बनता कि इन्हें पार्टी छोड़नी पड़ती। कुल मिलाकर साफ है कि कोई किसी को भी डूबो रहा है,  इस पर विवाद हो सकता है, परंतु भाजपा शिवसेना की विजयी चाल इन दोनो दलों को डूबो रही है। अभी देखना है कि कुछ बचता है या कांग्रेस-राकंपा पूरी की पूरी डूब जाती है।

Post a Comment

[blogger]

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget