हिंदी दिवस और उससे जुड़े सवाल

ज हिंदी दिवस है। पूरे देश में शिक्षासंस्थानों, सरकारी-अर्ध सरकारी उपक्रमों, साहित्यिक संस्थाओं में इसे लेकर लंबे-चौड़े वादे होंगे। भाषण और प्रतियोगिताएं होंगी। हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने  बातें होंगी। पूरा दिन हिंदीमय होगा। कारण कुछ के ऊपर बंधन है और कुछ ने ऐसा करने का बंधन अपने सर पर डाल लिया है। अच्छी बात है। इससे जागरूकता होती है। लोगों को राष्ट्रभाषा की  महत्ता का, आवश्यकता का भान होता है, परंतु ऐसा करते करते काफी लंबा समय बीत गया है। इस दौरान जिस अंग्रेजी को हम हटाने की बात करते है, उसकी पूछ हमारे देश में और बढ़ी है।  आज भी सही अर्थोंमें विभिन्न भाषा-भाषी भारतीयों के बीच संपर्क की भाषा अंग्रेजी ही है। आज भी अधिकांश हिंदी सेवियों के बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में ही पढ़ रहे हैं। यह स्थिति सिर्फ हिंदी भाषियों को लेकर है ऐसा नहीं है। कमोबेश यही सूरतेहाल देश की अन्य भाषाओं का भी है। उनमें तमिलनाडु जैसे कुख्यात हिंदीविरोधी राज्य है, जो अपनी राज्य की भाषा के साथ अंग्रेजी अपनाने से तो  गुरेज नहीं करता, परंतु यदि हिंदी शŽद उन्हें सुनाई पड़े तो होशोहवास खो बैठते है। इसके कई उदाहरण ल ही में तमिलनाडु में सामने आए है।  ऐसा नहीं है कि हिंदी इन सात दशकों में बढ़ी नहीं  है, पूरे देश में इसको पढ़ने,बोलने, समझनेवालों की तादाद  बढ़ी है।
 परंतु आज भी विविध राज्यों में इसका विरोध और इसकी   अंग्रेजी की तरह आवश्यकता न बना पाना, इसके राष्ट्रभाषा ना बन पाने का सबसे बड़ा कारण है, तो हिंदी दिवस मनाने की  औपचारिकता साथ-साथ इस मंथन कर विमर्श को ऐसा राष्ट्रव्यापी अभियान बनाना होगा, जिससे हमारे देश के कोने-कोने में अंग्रेजी को जो स्थान प्राप्त है और जिन आवश्यकताओं की प्राप्ति  अंग्रेजी कराती है वैसी ही हिंदी कर सके। ऐसा जब तक हम नहीं कर सकेंगे तब तक हिंदी की प्रगति कच्छप गति से ज्यादा नहीं होगी। हम इसे बढ़ाने का, देशव्यापी मान्यता दिलाने का दंभ भले  ही भरते रहे, यथार्थ की धरातल पर जो स्थिति आज है, वह जल्दी बदलती नहीं दिखाई दे रही है। हिंदी को यदि अपना स्थान पाना है, तो सभी हिंदी सेवियों को, हिंदी प्रेमियों को हिंदी को हर  दृष्टि से उस स्तर तक पहुंचाना होगा, जिस मुकाम पर आज अंग्रेजी है। आखिर क्या कारण है कि हम उस स्तर पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। आज हिंदी का विस्तार चीन की मंदारिन से भी ज्यादा  है। दुनिया के सबसे ज्यादा लोग इसे बोलने, जानने और समझने वाले हैं। फिर क्यों यह रोजी-रोटी की भाषा नहीं बन पा रही है। क्यों आज भी लोग यह कहते हैं कि विज्ञान, तकनीक और  चिकित्सा की पढ़ाई के लिए, अभियांत्रिकी की पढ़ाई के लिए अंग्रेजी जरूरी है। यह मानसिकता नहीं है, व्यवहारिकता यथार्थ है कि अंग्रेजी पढ़ा व्यक्ति हिंदी जानने वाले से भले ही तुलनात्मक रूप   कम ज्ञानी नहीं हो, ज्यादा तवज्जो पाता है इसीलिए हिंदी का विरोध करने वाले राज्य और मानने वाले राज्य अपनी-अपनी भाषा के तुलना में अंग्रेजी को ज्यादा तवज्जो, ज्यादा वरीयता देते नजर  आते है। अपनी भाषा में शिक्षा सस्ती होने के बावजूद मांटेसिरयों और निजी इंग्लिश स्कूलों में लाइन लगी रहती है। लोग मान-अपमान भूलकर वहां प्रवेश के लिए  डोनेशन भी देते है और  पंक्तिबद्ध खड़े रहते है।
 हमें हिंदी को ऐसा बनाना होगा, ऐसे सुसज्जित करना होगा कि पूरे देश के लोग उसेअपने आप ही अपनाएं, जैसा आज अंग्रेजी को अपना रही है। अपनी-अपनी मातृभाषा और राज्य की भाषा को  छोड़कर या तरजीह ना देकर उसे अपना रहे है। असली चुनौती इसका इलाज ढूंढ़ने की जरूरत है। बिना इसके सिर्फ दिवस मनाना, महज एक खानापूर्ति है। इससे जो चुनौती है, उसका सामना नहीं  होता। हमें चुनौती का सामना करना है और हिंदी को हर संभव तरीके से सुसज्ज कर ऐसा बनाना है, जिससे लोग अंग्रेजी को भूल कर उसे वैस ही सहर्ष अपनाएं, जैसे अंग्रेजी को अपना रहे हैं।

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