अस्तित्व बचाने की चुनौती

महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है और इसके साथ ही सियासी शतरंज पर गोटियां बिठाने का काम भी तेज हो गया है। पिछला विधान सभा चुनाव राज्य के प्रमुख  दलों, मसलन भाजपा-शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस एवं कांग्रस ने अलग-अलग लड़ा था। भाजपा इसमें सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। शिवसेना दूसरे और राकांपा चौथे और कांग्रेस तीसरे  स्थान पर थी। इस बार पुन: मुकबला युति और आघाड़ी में है। फर्क यह है कि इस बार युति अपने आप में अजेय बन चुकी है। राजनीतिक विश्लेषक और सर्वेक्षण अकेले भाजपा को  बहुमत से कहीं आगे दिखा रहे हैं और युति को दो तिहाई से ज्यादा सीटें दे रहे हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस और राकांपा की हालत पतली ही नहीं है बल्कि अस्तित्व पर भी संकट नजर  आ रहा है और ये दोनों दल पिछले चुनाव इतनी सीटें भी इस बार विधान सभा में प्राप्त करेंगे, इस बारे में बड़ा संदेह है। इसके पीछे पुख्ता कारण है। कांग्रेस और राकांपा से पार्टी  छोड़कर जाने वालों की संख्या इतनी ज्यादा है कि लगता है कि दोनों पार्टियां और विशेषकर राकांपा पूर्णत: नेता विहीन हो गई है। उसके अतीत के अधिकांश क्षत्रप और यहां तक कि  स्वयं छत्रपति उदयन राजे भोंसले आज भाजपा में हैं। कमोबेश यही हाल कांग्रेस का है जिसके कई बड़े नेता आज भाजपा में हैं और कई अभी भी ऐसे हैं, जो मौके की ताक में है।  इससे साफ है कि वे पार्टी को रसातल में जाता देख रहे हैं। लोक सभा में राकांपा के सर्वराकार नजर आ रहे अजीत पवार आज-कल कहां हैं? पता ही नहीं चल रहा है और पवार   साहेब पार्टी बचाने और उसमें जान फूकने के लिए पूरे महाराष्ट्र का चक्कर लगा रहे हैं? मतलब साफ है कि कांग्रेस और राकांपा पांच साल में किसी भी मुद्दे पर भाजपा नीत सरकार  को उलझा नहीं पाए, एक भी आरोप ऐसी नहीं लगा पाए, जो टिके उलटे उनके नेता भ्रष्टाचार के आरोपों को झेलने और उनसे पीछा छुड़ाने में ही पिछले पांच साल लगे रहे। इसके  बाद भी वे आरोप इनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं और तो और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस राकांपा का खेल बिगाड़ने में निर्णायक भूमिका निभा चुकी वंचित आगाड़ी और ओवैसी की पार्टी  पुन: एक बार इन्हें छकाने की तैयारी में है, जबकि भाजपा केंद्र सरकार द्वारा लिए गए एतिहासिक निर्णयों और राज्य में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस द्वारा किए गए कार्यों की आभा  से दपदपा रही है और विपक्ष उसके प्रकाश में चौंधियाया हुआ है। ऐसी हालत में उसे कुछ भी हासिल की उम्मीद नहीं है, इसके अलावा आज जिस तहर के नेतृत्व पार्टी के पास है,  जिस तरह का गुटवाद हावी है वह भी इनकी दशा को और बिगाड़ रहा है। जिन मुद्दों को छूने से कांग्रेस कतराती थी उस पर भाजपा ने न सिर्फ ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय  लिया, बल्कि कांग्रेस के उस दबाव को भी तार-तार कर दिया, जिसके तहत वह 370 हटाने जैसे मुद्दे को असंभव बताती थी, ऐसे में उनके कार्यकर्ताओं के लिए बोलने को कुछ नहीं  बचा है। कुल मिलाकर विपक्ष हर तरह से पस्त और मुद्दाविहीन है और उसके नेता या तो पार्टी छोड़ रहे हैं या आरोपों से बचने का रास्ता खोज रहे हैं, जो बचे-खुचे हैं वे पार्टी में  व्याप्त कलह और टांग खिचाई से परेशान हैं। ऐसे में अस्तिव ही बचे, तो भी ठीक है परंतु उनकी हालत और दशा उससे भी खराब होने का संकेत दे रही है। आज इनके सामाने
चुनौती अस्तित्व बचाने की है।

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