क्षेत्रवाद, परिवारवाद और जातिवाद का समापन!

देश में आजकल एक मंथन चल रहा है। 2014 का लोकसभा चुनाव पहला ऐसा चुनाव था, जिसके परिणाम से इसकी शुरुआत हुई। पहली बार ऐसा लगा कि देश की जनता देश में  जिस तरह की राजनीति चल रही है, उससे आजिज है। वह क्षेत्रवाद, जातिवाद और परिवारवाद से ऊब गई है। इसकी आड़ में बढ़ रही भ्रष्टाचार की गंगोत्री ने उसकी नाक में दम कर  दिया है और उससे वह मुक्ति चाहती है। गत लोकसभा चुनाव में उसकी शुरुआत हुई। उसके बाद लगभग हर राज्य के चुनाव में यह सोच और बलवती हुई। जाति और वर्ग का नारा  देते हुए परिवार का भला करने वाली पार्टियां और उन सŽबको साथ लेकर तालमेल बिठाकर सत्ता की माला पहनने वाली कांग्रेस पार्टी निरंतर कमजोर होती चली गई। इस पर  निर्णायक प्रहार हुआ। 2019 के लोकसभा चुनाव में, जब ऐसी शक्तियों का एकल और सामूहिक प्रयास भी नाकाम हुआ। राष्ट्रवाद, सबका साथ और सबका विकास का नारा देने वाली  शक्तियां उतरोत्तर प्रबल होती जा रही है। जिन राज्यों में अभी क्षेत्रवादी दल थोड़े-बहुत मजबूत हैं, वहां भी राष्ट्रवादी शक्तियां सबका साथ, सबका विकास तथा सबका विश्वास की  अपनी उद्घोषणा के साथ निरंतर मजबूत हो रही है। जिसका असर देश के हर अंग में दिखाई दे रहा है। आज पूरी दुनिया में हमारी ऐसी धमक है कि पाक का रोना तथा मुस्लिम कार्ड खेलना भी नाकाम हो गया है। पाक चीत्कार कर रहा है, परंतु दुनिया का कोई देश उसे घास नहीं डाल रहा है। एक दौर वह था, जब पूरा देश कश्मीर को लेकर परेशान था।   आज सारा देश पीओके को लेकर दावा ठोंक रहा है। यह फर्क है छह साल की पहली की राजनीति में और आज की राजनीति में। यह सब इसलिए हुआ कि राजनीति का आत्मघाती   तौर-तरीका बदला है। आज की सरकार के लिए पूरा देश उसका मत बैंक है, जबकि अतीत में कई खेमेबंदियां थी, जो जाति और परिवार हित तथा विशेष धर्मावलंबियों के विशेष हित  के पक्ष में थे। जिससे देश में पारस्परिक द्वेष बढ़ रहा था। विकास भोथरा हो रहा था और भ्रष्टाचार और तमाम तरह के वादों की कुत्सित नदी में नहाकर कुछ परिवार मालामाल हो  रहे थे। भाजपा के मोदी युग में इन सब पर ताला लग रहा है और एक जमाने की अजेय शक्तियां माया, मुलायम, ममता और शरद पवार अब किसी तरह से अपना अस्तित्व बचाने   की जद्दोजहद में लगे हुए हैं, जबकि जो छत्रप अभी भी टिके हैं मसलन स्टॉलिन और केसीआर वह भी क्षेत्रवाद, सबका साथ और सबका विकास की आंधी का भयाक्रांत मुकाबला कर  रहे हैं, परंतु उनकी पकड़ लगातार ढीली हो रही है। यह नए भारत की धमक है, जिसने दुनिया के भारत को देखने का नजरिया ही नहीं बदला, बल्कि देश की राजनीति की दिशा और  दशा बदली है। अजेंडे ने जाति और धर्म को न रखकर भारत के हर नागरिक को रखा है। वह किसी जाति का, किसी क्षेत्र का ख्याल रखकर योजानाएं नहीं बनाता। उसका लक्ष्य हर  भारतवासी को यह एहसास दिलाना है कि समूचा भारत उसका है, हर भारतवासी उसके है। वह सबके लिए काम करता है। वह सिर्फ बताता नहीं, करके दिखाता है और इसलिए  उसका हरा और भगवा झंडा पूरी देश में लहलहा रहा है, तो अब हर उस दल को जो क्षेत्र को, जाति को, भाषा को, परिवार को अपना हथियार बनाकर राजनीति में अपना उल्लू साधने  का प्रयास करता है। अपना अजेंडा बदलना होगा। अब सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास तथा राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार मुक्त शासन ही चलेगा। माया, ममता, मुलायम और  पवार का हो रहा हश्र तथा तमिलनाडु और आंध्र में भी उतरोत्तर प्रबल होती उक्त Žबयान बता रही है।

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