कड़वी दवा जरूरी

मोटर व्हीकल एक्ट 1988 में संशोधन को संसद की मंजूरी मिलने के बाद एक सितंबर से यातायात के नए मगर कठोर नियम लागू हो गए हैं। नए नियमों के तहत देश के कई भागों   में काटे गए चालानों की वजह से देशभर में यातायात के कठोर नियमों की आलोचना भी हो रही है और केंद्र सरकार पर अंगुली भी उठ रही है। नए कानून में जुर्माने और सजा के   जो प्रावधान हैं, वे पहली नजर में ही हर किसी को चौंका देते हैं। हेलमेट नहीं पहनने पर दुपहिया वाहन चालक को पहले के 100 रुपए की बजाय अब 10 गुना ज्यादा यानी एक   हजार रुपये जुर्माना भरना पड़ेगा। कार में सीट बेल्ट नहीं पहनने पर भी 100 रुपए की जगह 1000, बिना इंश्योरेंस के गाड़ी चलाने पर मौजूदा 1000 रुपए के स्थान पर 2000 रुपए,  रोड रेज 500 रुपए की जगह 10 गुना ज्यादा 5 हजार रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा। सीट बेल्ट नहीं पहनने पर भी जुर्माने की रकम 10 गुना कर दी गई है। शराब पीकर गाड़ी  चलाने और खतरनाक ढंग से ड्राइविंग करने पर जुर्माना 5 गुना तक बढ़ा दिया है। ड्रंकन ड्राइविंग पर जेल की सजा का भी प्रावधान है। नाबालिग की ड्राइविंग के मामले में जुर्माना   एक हजार से बढ़ाकर 25 हजार और तीन महीने जेल की सजा को बढ़ाकर तीन साल कर दिया गया है। नाबालिग के खिलाफ भी जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत कार्रवाई की  जाएगी। हिट एंड रन मामले तेजी से बढ़े हैं। वर्ष 2018 में ऐसे 55 हजार केस आए थे, जिनमें 22 हजार लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। नए कानून के मुताबिक ऐसे मामले में  पीड़ित के घायल और मृत होने पर आरोपी वाहन चालक पर साढ़े 12 हजार और 25 हजार जुर्माने की व्यवस्था की गई है। हालांकि सड़कों के नियमों के उल्लंघन और हादसे की  स्थिति में सारी सजा वाहन चालकों के लिए ही नहीं हैं, बल्कि वाहन की गलत बनावट और उससे सुरक्षा के मानदंड पूरे नहीं होने पर वाहन डीलर पर एक लाख रुपए और निर्माता  पर 100 करोड़ के जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। दोषपूर्ण सड़क बनाने वाली कंपनी या ठेकेदार पर एक लाख रुपए जुर्माने की बात नए कानून में है। इसके तहत मोटर  दुर्घटना कोष भी बनाया जाएगा, जो सड़क का इस्तेमाल करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अनिवार्य बीमा कवर देगा, लेकिन सड़क के गड्ढों के लिए इंजीनियर-ठेकेदारों को शायद ही  कभी तय जुर्माना चुकाने के लिए बाध्य किया जा सके, क्योंकि वे तो व्यवस्था यानी सिस्टम से मिलकर ही खराब सड़कें और बदतर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करते हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन  मंत्री नितिन गडकरी ने नए यातायात नियमों को लेकर स्पष्ट किया है कि चाहे कुछ हो जाए, इससे संबंधित फैसले पर यूटर्न मुमकिन नहीं है। दंड की राशि बढ़ाने का मकसद लोगों  को सतर्क रहने के लिए बाध्य करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यातायात नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने में भारी वृद्धि का फैसला कानून का पालन अनिवार्य बनाने के लिए किया  गया है, न कि सरकारी खजाने को भरने के मकसद से। उनका कहना है कि देर-सबेर देश में लोगों को जुर्माने से बचने के लिए यातायात नियमों का पालन करने की आदत पड़  जाएगी और इस तरह सड़कों को महफूज बनाया जा सकेगा, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा सवाल दंड और जुर्माने की राशि का है। जुर्माने की रकम में भारी इजाफे पर जनता को  आपत्ति है। इसी को कारण बताते हुए पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और तेलंगाना की सरकारों ने नए कानून को लागू करने से इनकार कर दिया है। उधर राजस्थान सरकार ने साफ  किया है कि जुर्माने की राशि की समीक्षा के बाद ही इस पर निर्णय लिया जाएगा। लेकिन क्या जुर्माने में कमी करके हादसों को थामा जा सकता है। विदेशों के अनुभव बताते हैं कि  वहां सड़कों पर अनुशासन कायम रहने के पीछे एक बड़ी वजह ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के दोषियों पर लगने वाला भारी जुर्माना है। जिक्रयोग्य है कि देश में चार लाख के करीब  लोग दुर्घटनाओं में घायल होते हैं और हजारों अपनी जान गंवा लेते हैं। सड़क पर बढ़ते वाहनों की संख्या के कारण सड़कों पर दबाव भी बढ़ रहा है। सड़कों का रखरखाव खराब होने   कारण भी लोग सरकार को कोस रहे हैं। जनता का मानना है कि जुर्माने की राशि बढ़ने से रिश्वत बढ़ेगी। तस्वीर के दो पहलू हैं, एक तो यह कि जुर्माने की राशि बढ़ने और कैद का  प्रावधान होने के कारण धीरे-धीरे वाहन चालक यातायात नियमों को लेकर सतर्क तो अवश्य होंगे और दुर्घटनाएं भी कम होंगी। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि सड़कों के रख-रखाव  और निर्माण कार्यों के कारण होने वाले सड़क हादसों के लिए क्या कोई अधिकारी दोषी ठहराया जा सकेगा? पिछले समय में हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में ही कई ऐसे  स्थान छानबीन में सामने आए थे, जहां सड़क दुर्घटनाएं अधिक होती हैं। उन स्थानों को लेकर सरकार ने अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए। केंद्र और प्रदेश सरकारों को यह भी  सुनिश्चित करना चाहिए कि अगर सड़क निर्माण या उसके रख-रखाव के कारण सड़क हादसा हुआ है, तो संबंधित विभाग और उसके अधिकारी को भी उस द्वारा की लापरवाही की  सजा मिलनी चाहिए। जालंधर में पीएपी के नजदीक पुल का एक भाग यातायात के लिए आजतक शुरू नहीं किया जा सका, क्योंकि उसकी ड्राइंग ही ठीक ढंग से नहीं बचाई गई।  उसकी बनावट के कारण ही दुर्घटना होने की पूरी संभावना है। यह तो एक उदाहरण मात्र है राष्ट्रीय स्तर पर तो ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे। समय की मांग है कि बढ़ती सड़क  दुर्घटनाओं को देखते हुए समाज और सरकार दोनों को मिलकर इस समस्या का सामना करना चाहिए एक दूसरे पर आरोप लगाने से कुछ नहीं होने वाला। व्यावहारिक हो कदम उठाने  की आवश्यकता है।

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