वर्ष दर वर्ष की त्रासदी

एक बार फिर बारिश ने मुंबई की रफ्तार रोक दी। लोगों का आवागमन ही नहीं दूभर किया कइयों को रात प्लेटफार्म और अन्य आश्रयों में गुजारना पड़ा। कई लोकल बंद होने के नाते  मीलों बारिश के बीच रेल ट्रैक पर चलकर अपने घर पहुंचे। इसमें कोई दो राय नहीं कि बारिश जबर्दस्त थी, मूसलाधार थी, अप्रत्याशित थी, लेकिन ऐसा मुंबई और आसपास  के  इलाकों में पहली बार नहीं हुआ। ऐसा अनेकों बार हो चुका है। प्राकृतिक क्रिया-कलाप पर हम कुछ नहीं कर सकते, उसे हमें झेलना ही होता है, परंतु जिस तरह के हालात बारिश  के  दौरान बनते हैं, उसका कारण सिर्फ प्राकृतिक है इसको मानने को भी विज्ञ व्यक्ति तैयार नहीं होगा। जिस तरह से नालासोपारा तालाब बन जाता है और मुंबई के कई अन्य क्षेत्र जलमग्न होते हैं। उससे साफ है कि स्थानीय निकाय की जिन संस्थाओं के पास नदी-नाले साफ करने की जिम्मेदारी है वे अपना काम सही ढंग से नहीं कर रहे हैं। जिस तरह जलनिकासी की व्यवस्था होनी चाहिए वैसा मुंबई और उसके आस-पास की मनपा-नपाओं में नहीं हो रही है। पानी के समुचित प्रवाह के लिए जैसे साफ-सफाई की जरूरत है, वैसा नहीं  हो रहा है। इसके लिए जनता भी कम जिम्मेदार नहीं है। तमाम बंदिशों के बावजूद उसका प्लास्टिक मोह कम नहीं हो रहा है और इन सबका प्रतिफल यह है कि जब बरसात  होती  है, तो चाहे कम हो या ज्यादा शहर हलाकान हो जाता है और यदि ऐसी तीव्र बारिश होती है जैसी बुधवार को हुई तो सब कुछ ठप हो जाता है। यह एक ऐसी चकरघिन्नी बन गई है,  जिसमें पूरा मुंबई या आस-पास का इलाका झूल रहा है और एक तरह से इस त्रासदी को झेलने को आदी होता जा रहा है। शायद यही कारण है कि बारिश से सराबोर रेल ट्रैक से  अपने गंतव्य तक पहुंचाने की जद्दोजहद्द करता है। अबाल, वृद्ध और नर-नारी का दर्द भी उन्हें इतना नहीं जगा रहा है कि वे ऐसा कुछ प्रयास कर रहे हैं, जिससे संवेदनहीन और भ्रष्ट  लोग जो इन स्थानीय निकायों पर काबिज हैं, उन्हें अपने कर्तव्यों का बोध हो और वे ऐसा कुछ करें और सोचें कि जब बारिश आए, तो उनका इलाका बाढ़ग्रस्त न हो। कारण जीने की लिए पानी का स्थान हवा के बाद दूसरा है, इसकी जरूरत है। हमने पर्यावरण का इतना अनुचित संदोहन किया है कि जानकार कहते हैं कि पानी आएगा और कम समय आएगा, परंतु रफ्तार काफी तेज होगी। जब महीने भर का पानी एक दिन में बरसेगा, तो आफत आएगी ही, परंतु यदि उसका सामना करने की पूरी तैयारी होगी। जल प्रवाह की मजबूत और चौकस व्यवस्था होगी तो ऐसी स्थिति आने पर भी जिस तरह की दुर्गति लोगों की होती है। जिस तरह का आर्थिक नुकसान व्यक्तिकऔर सार्वजनिक होता है, कदापि नहीं होगा। साथ  ही प्रशासन को मीरा रोड से विरार के लिए वैकल्पिक सड़क मार्ग जो रेल लाइन के समांतर हो के बारे में भी सोचना होगा। जिससे आम जनता ऐसी बारिश में रेल ट्रैकों में भटकने  की बजाय उसको अवलंब ले अपने घर पहुंच सके। कारण जो मौजूदा सड़क मार्ग है, वहां काफी घूमकर उक्त स्थानों पर पहुंचता है जिसे आपातकाल में जब बाढ़ की स्थिति हो काफी  सावधानी से उपयोग में लाया जा सकता है। कारण वहां हमेशा भीड़ होती है। कारण अब महानगर का रेला कम हो रहा है और ज्यादातर आŽबादी पालघर और आसपास के क्षेत्रों में  रहती है और उन स्थानों से रोज मुंबई काम पर आती हैं, जिनका निवास उक्त इलाकों में है और उनके लिए लोकल सेवा ही सबसे अच्छी सुरक्षित और अफोर्डेबल है, परंतु आपदा के  समय में विकल्प कैसे उपलब्ध हों इस पर और स्थानीय निकायों का काम कैसे और चाक चौŽबंद हों इस पर प्रशासन और नीति नियंताओं को विचार करना जरूरी है।

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