इमरान की उल्टी गिनती शुरू

अपने जन्म से लेकर आज तक यदि पाक के अतीत पर नजर डालें, तो दो चीजें वहां सतत् परिलक्षित होती रही हैं, जिसमें एक है हमारे प्रति द्वेष और दूसरा वहां के शासनतंत्र पर  सेना और उसके खुफियातंत्र का शिकंजा। नेताओं और सेना ने मिलकर हमेशा हमारे खिलाफ द्वेष भड़काया और हमसे दो-दो हाथ करने की कोशिश भी की। हर बार बुरी तरह पिटे  फिर भी कोई सफलता नहीं मिली और जैसे-जैसे यह समझ में आया कि परंपरागत तौर-तरीक के युद्ध से हमसे नहीं निपट सकते, तो उन्होंने आतंकवाद और छदम्मयुद्ध को हमारे  खिलाफ हथियार बनाया और हमारे यहां के हर गुमराह तत्व को या असंतोष को हर तरह से शह देने का काम किया। वह चाहे खालिस्तान आंदोलन का दौर रहा हो या कश्मीर में  माहौल बिगड़ना हो या देश में कहीं भी आतंकी हमले हों हर जगह उसका नाम, उसकी संलिप्तता हमेशा सर्वोपरि रहती थी। यह खेल आज नहीं लगभग तीन दशकों से ज्यादा समय  से लगातार जारी है। हमने मय सबूत इन Žबातों को उसके सामने रखा, चेतावनी दी। समझदारी की उम्मीद की, परंतु इससे कुछ सबक लेकर अपनी राह बदलने की बजाय उसने इसे   हमारी कमजोरी मानी और आतंक के कारोबार को लेकर उसका दुस्साहस इस कदर बढ़ गया कि दुनिया में अधिकांश आतंकी हमलों में उसके सरजी पर पालित-पोषित आतंक के  कारोबारियों का और किरदारों का नाम, उनकी संलिप्तता सबूत के साथ दुनिया के सामने आ रही है। साथ ही 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग की सरकार आने के बाद भी  पाक से बंद बातचीत से आगे जाकर उन्हें निंत्रण भेजा गया कि वे शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हों इस उम्मीद के साथ कि नई सरकार के इस निमंत्रण के पीछे के संदेश को  समझेंगे और यह खूनी खेल जो उनकी धरती से और उनकी सेना और सरकार के नुमाइंदों की ओर से हर तरह से सहयोग के बलबूते खेला जा रहा है। उस पर पाक पुनर्विचार करेंगे।  उस पर रोक लगेगी। परंतु पाक ने वह इशारा नहीं समझा और उसका खेल जारी रहा। उरी और पुलवामा के बाद हमने प्रधान मंत्री मोदी के नेतृत्व में क्या किया सब जानते हैं।   कारण इमरान जैसे पठान भी पाक से इस खेल पर लगाम लगाने की बजाय ऐसी हरकत करते नजर आए जो उनके पूर्ववर्ती पाक शासकों को भी शर्मिंदा कर दे। वह सब मानते हैं,   सब जानते हैं कितने आतंकी हैं, कहां है? पर उन पर लगाम लगाना और उक्त कारोबार बंद करना नहीं चाहते हैं, वे हमारे जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से पर नाजायज काबिज हैं, जो  खुद उनसे मुक्ति की गुहार लगा रहा है। उनकी सरकार और उनकी सेना द्वारा बलूचियों, सिंधियों पर अत्याचार के आरोप लगा रहे हैं, परंतु उन्हें जुम्म-कश्मीर के रियाया की चिंता  है, जिसे जो भी कष्ट मिला है उसका शुरू से लेकर आज तक जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ पाक और उसके भाड़े के हैवान हैं। जब इमरान जैसा आदमी जो एक जमाने से कुछ  आशापूर्ण बात करता था। पाक का प्रधान बनने के बाद अनधिकृत बयानबाजी अनधिकृतचेष्टा कर रहा है, तो यह मान लेना चाहिए कि या तो वे बेबस हैं या उनका भी असली चेहरा  यही है, जो अपनी रियाया की चिंता करने की बजाय दूसरे देश के आंतरिक मामले में टांग अड़ाकर आंतरिक बदहाली और सत्ता का अत्याचार झेल रही उसकी रियाया का कष्ट दूर  करने की बजाय अपना समय श्रम और बहुत कुछ पैसा हमारे खिलाफ दुनिया में गुहार लगाने के लिए खर्च कर रहा और जैसे दुनिया नहीं सुन रही है और जो इसी के रोटी खाने वाले   पाक में असली निजाम यानि सेना को नहीं रास आ रहा है और ऐसी गतिविधियां और सुगबुगाहट अब पाक से उसकी सेना और कट्टरपंथी तबका शुरू कर चुका है जिससे उनकी  उल्टी गिनती शुरू हो गई है। लगता है पाकिस्तान में सेना फिर से पुराना इतिहास दोहराने के लिए हाथ-पांव मार रही है, परंतु इससे उसका भला होगा, नहीं लगता। कारण आतंक की   दुकान पर पूर्णत: ताला लगाए बिना उसे मुक्ति नहीं है। जिस राह पर वह है उस पर बरबादी के सिवाय कुछ नहींमिलेगा। चाहे उसकी सत्ता सेना के हाथ में हो या इमरान के। कारण  आज भी सेना ही वहां सब कुछ है जैसा कि अतीत में और चुने हुए शासक उसके खिलौने तो जब तक सेना सही अर्थों में सेना नहीं बनती और शासक बनी रहती है। पाक का कोई  भविष्य है, ऐसा नहीं लगता। कारण आतंक का कारोबार उसका एजेंडा है और हर पाक सरकार भी उसे चलाने के लिए बाध्य है और पूरी दुनिया पाक की इस हकीकत को जानती है। 

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