हमारे त्यौहार और हमारी मान्यताए

हमारा देश विभिन्नताओं का ऐसा संगम है, जैसे बोली में, पहनावे में, खानपान में विभिन्नता है, परंतु उसमें अंतर्निहित प्रवाह विशुद्ध भारतीय है। ठीक वैसा ही हमारे त्यौहारों के साथ  है। हम हर त्यौहार मनाते हैं। जी भर कर मनाते हैं। एक ही त्यौहार पूरे देश में अलग-अलग तौर-तरीकों से मनाते है, परंतु उसमें निहित यथार्थ यही है कि अच्छाई को अपनाना और   बुराई का त्याग करना। दशहरा भी वैसा ही त्यौहार है, जिसके आख्यान में यही तथ्य बार-बार सामने आता है कि बुराई चाहे कितनी ही बलवान क्यों न हो जाए, वह बुराई ही है और  उसे अंतत: पराभूत या तिमिर-तिरोहित होना पड़ता है। तो आइए जगत जननी जगदंबा का भजन पठन करते हुए और मर्यादा पुरषोत्तम भगवान राम की रावण पर विजय का पर्व   मनाते हुए संकल्पाबद्ध हों सत्य और सेवा की राह पर चलने के लिए। कारण उसी राह पर ही व्यक्ति और समाज का कल्याण है। रावण विद्वान था, अकूत संपत्ति का और शक्ति  का मालिक था, परंतु भ्रष्टाचारी था और जो अंत में उसके समूल विनाश का कारण बना। भगवान ने एक साधारण मानव के रूप में उसकी चकाचौंध करने वाली शक्तियों को ललकारा  और उन्हें समाप्त किया। हमारे समाज में हमारे बीच आज भी तमाम रावण घूम रहे हैं, जिनके क्रिया-कलाप कभी अबोधों के साथ बलात्कार, कभी दहेज के नाम पर हत्या, कभी  भ्रष्टाचार, कभी अपराध और न जाने कितने रूपों में हमारे सामने आते रहते हैं और हमें दहलाते रहते हैं। हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम माता की पूजा करने के तभी  सही अर्थों में हकदार हैं, जब हमारी बहन, बेटी, माता हर तरह से सुरक्षित हैं और उन्हें भी उनके विकास के सभी अवसर बिना भेदभाव के सहज उपलब्ध है और वे हर जगह चाहे  पिता का घर हो या पति का सुरक्षित और सम्मान्नित है। समाज के ऐसे रावणों के खिलाफ और ऐसी नीतियों और कुरीतियों के खिलाफ हमें गोलबंद होना पड़ेगा। बुराई पर अच्छाई  की विजय पर उत्सव मनाने के साथ-साथ हम समाज में जहां कहीं किसी भी स्तर पर किसी भी तरह की बुराई नजर आए, तो उसके खिलाफ मुखर होना पड़ेगा। इससे हमारे उत्सव  मनाने की सार्थकता और बढ़ जाएगी। इन त्यौहारों के शुरू करने के पीछे हमारे पूर्वजों की भावना भी यही लगती है कि वर्ष दर वर्ष इन्हें मनाकर हमें जहां एक ओर भावी पीढ़ी को    उन शाश्वत मूल्यों का एहसास कराना है, जो चिरंतन है और जिन पर मानवता टिकी हुई है। साथ ही मौजूदा पीढ़ी को उस पर सतत् संकल्पबद्ध रखना है। कारण ये ऐसे मूल्यों के  प्रतीक है, जिन्हें अपना कर मानव अपना और समाज का जीवन सुखी कर सकता है। यह अनायास ही नहीं है कि आज पूरी दुनिया हमारे योग को अपना रही है। हमारे जीवनशैली  को, हमारे मूल्यों को अपना रही है। हमारे त्यौहार और उसका मकसद उन्हें आकर्षित कर रहा है और भारत बड़ी तेजी से एक बार फिर दुनिया की नजर में सुनहरी चिड़िया बन रहा   है। यदि तमाम नकारात्मकताओं के बावजूद आज यह स्थिति है, तो हमेशा सही राह पर चलेंगे, तो हम कहां होंगे, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इसलिए आइए हर   उत्सव जीभर कर मनाएं और उसमें अंतर्निहित संदेश को आत्मसात करें और अपना, अपनों का, समाज का तथा देश का जीवन खुशहाल बनाएं। इसी में हर उत्सव की सार्थकता है  और दशहरे की भी।

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