व्यवस्था का चुस्त दुरुस्त होना जरूरी

बैंक और उनका चुस्त दुरुस्त संचालन किसी भी अर्थ व्यवस्था की नीव है। हाल के वर्षों में जिस तरह के घपले-घोटाले कुछ निजी और सरकारी Žौंकों में होने की खबरें आम हुई हैं। कैसे-कैसे  लोगों ने अनाप-शनाप तरीके से कर्ज लिए और लेकर रफूचक्कर हो गए और उन्हें वापस लेने के आज भी प्रयास जारी हैं। उनसे वसूली करने के लिए आवश्यक कानून में सुधार से लेकर तमाम  कदम उठाए गए और उठाए जा रहे हैं। इस कड़ी में हमारे सहकारी बैंक हैं, जिनमें कइयों के ध्वस्त हो जाने और कइयों के दल-दल में आने की बातें सुर्खियां बनती रही हैं। कैसे ये बैंक मध्यम  और न्नि मध्यम वर्ग या किसान मजदूर को कर्ज देने में नाकों चने चबवाते हैं और रसूखदार या धनी वर्ग के सामने बिछ जाते हैं। उसके लिए कायदे और नियम ताक पर रखे जाते हैं, सब  जानते हैं। अभी ताजा मामला पीएमसी बैंक का है, जिसमें ऐसे ही हेर फेर की बातें सामने आ रही हैं। कई लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। छानबीन जारी है। ऐसी घटनाओं से आम खाताधारकों का जो  नुकसान होता है, जो परेशानी उन्हें  झेलनी पड़ती है, यह पूरी व्यवस्था के लिए एक प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है और उसकी साख पर बट्टा लगाता है। यदि लोग वहां नहीं पैसे रखेंगे, तो कहां रखेंगे  और यदि वहां पैसे सुरक्षित नहीं है, तो कहां है। पहले भी ऐसी परिस्थितियां आई हैं, तो उस पर कार्रवाईयां भी हुई हैं। ऐसे मापदंड भी बनाए गए हैं, जिससे ऐसी परिस्थितयां न बनें। फिर भी  लोग भ्रष्टाचार के लालच में या अपने पद के गुरूर या दबाव में ऐसे करते हैं, जिससे ऐसी परिस्थतियां पैदा हो रही हैं। केंद्र सरकार ने पिछले घपलों-घोटालों के बाद ऐसे कई कदम उठाए हैं, जिससे ऐसी परिस्थितयां न बनें और यदि बन भी जाएं, तो इनसे इस तरह से निपटा जाए कि कोई दूसरा ऐसा करने की हिम्मत न जुटा पाए। सहकारी बैंकों और सोसायटियों पर भी अब गंभीर  कार्रवाई करने की जरूरत है। कारण यह क्षेत्र पूरे देश में ज्यादातर खस्ताहाल है। कई राज्यों के राज्य सहकारी बैंक दल दल में फंसे हैं। महाराष्ट्र में भी सत्तर लोगों पर मामले दर्ज हैं। अब पीएमसी बैंक का मामला सामने आया है। ऐसा लगता है कि इतने नियमों के बाद भी, कड़ी निगरानी के बाद भी यदि ऐसी चीजें नहीं बंद हो रही हैं, तो कहीं न कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ तो जरूर  है।
जिसको समझना और तद्नुसार उसका इलाज करना बैंकिंग व्यवस्था के सुचारू  संचालन के लिए निहायत जरूरी है। जनता अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा, अपनी जरूरतों मे कटौती कर अपने  सुनहरे भविष्य के लिए जमा करती है। एक दिन अचानक उसे पता चले कि वह अब उसका नहीं रहा, यह सही नहीं है। यह उसे आधा-पौना मिले, तो भी यह उचित नहीं है। ऐसी अवस्था न बने  इसके लिए केंद्र और राज्य के वित्त विभाग और आरबीआई को कड़ा कदम उठाना होगा। कड़े कदम उठाए नहीं जा रहे हैं, ऐसा नहीं है, परंतु उसके बाद भी ऐसी घटनाओं का होना यह जाहिर करता है कि अभी ऐसा बहुत कुछ किया जाना जरूरी है, जिससे बैंकिंग व्यवस्था और चुस्त-दुरुस्त हो और ऐसे घपलों  घोटालों और संदिग्ध सौदेबाजियों की कोई जगह न हो और व्यवस्था की  साख पर बट्टा न लगे और न ही लोगों का जनजीवन प्रभावित हो। 

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