मंजिल पर पहुंचने के लिए चढ़नी पढ़ती हैं सीढ़ियां : आदित्य ठाकरे

मनोज दुबे / जितेंद्र मिश्रा - मुंबई
वे ठाकरे खानदान के पहले शख्स हैं, जो चुनाव मैदान में उतरे हैं। वर्ली से शिवसेना से चुनाव मैदान में उतरने से पहले आदित्य ठाकरे ने जनआशीर्वाद यात्रा के माध्यम से पूरे  महाराष्ट्र का दौरा किया। वे मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री बनने के सवाल को टाल जाते हैं, लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि मंजिल पर पहुंचने के लिए सीढ़ियां तो चढ़नी ही पड़ती हैं। आरे  में मेट्रो कारशेड बनाने को लेकर वे सरकार के साथ दो- दो हाथ कर चुके हैं। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश: 

आपके दिमाग में चुनाव लड़ने का ख्याल कब आया? 
पहले से चुनाव लड़ना चाहता था। घर का माहौल ही कुछ इस तरह का है। पिछले 9 साल का अनुभव रहा। जो लोग चुनाव जीतकर आते हैं, उन्हें काम करने का अवसर मिलता है।  पिछले बार ही चुनाव लड़ना चाहता था, लेकिन उस व€त उम्र केवल 24 साल थी। जहां तक वर्ली से चुनाव लड़ने का सवाल है तो वर्ली पूरे महाराष्ट्र का प्रतीक है। यहां परंपरागत  मराठी वोटर तो रहते ही हैं, साथ ही हर जाति, धर्म के लोग भी रहते हैं। यहां कोलीवाड़ा है, जहां मुंबई के सबसे पहले निवासी रहते हैं। गगनचुंबी (हाईराईज) इमारतें, स्लम सब कुछ  यहां हैं। यदि यहां से चुनाव जीता तो काम काफी चैलेंजिंग होगा। इमारतों के पुनर्निर्माण का काम है, इसे आगे ले जाना है। हर दिन क्षेत्र में हजारों लोग काम करने आते हैं, उन्हें भी  अलग अनुभव प्रदान कराना है।

अभी तक ठाकरे परिवार रिमोट से सरकार चलाता रहा है
रिमोट कंट्रोल तो उद्धव जी के पास ही है। किसी को तो टीवी बनना चाहिए। राजनीति में आपकी मंजिल क्या है? अभी तो विधायक बनकर ही जाना है। जो भी जनता चाहेगी, वह  काम करूंगा। कई लोग अपनी जिंदगी का मकसद एक पद को बना देते हैं। अभी तो चुनाव लड़ रहा हूं, लेकिन किसी मंजिल पर जाना है तो सीढ़ियां तो चढ़नी पड़ती हैं। 

आपकी  जिंदगी पर सबसे अधिक किसका प्रभाव है, बाला साहेब या उद्धव ठाकरे?
सबसे अधिक प्रभाव शिवसैनिकों का पड़ता है, वे रात-दिन हमारे साथ काम करते हैं। ऐसा माना जाता है कि कई मसलों पर शिवसेना ने अपना रुख नरम किया है? बाला साहेब  ठाकरे भी हमेशा सभी को साथ लेने की कोशिश करते थे। उनके पुराने भाषण आप सुन सकते हैं। कश्मीरी पंडितों को महाराष्ट्र ने अपनाया। हम सभी वर्ग के लोगों के लिए लड़ते- झगड़ते हैं। सभी को सेवा देने की कोशिश करते हैं। हालांकि जब सभी तरह ताकत बढ़ रही है तो हर जगह एग्रेसिव होने की जरूरत नहीं है। रणनीति में एग्रेशन होना चाहिए।

आरे में मेट्रो कारशेड का आपने विरोध किया, लेकिन वहां पेड़ काट दिए गए?
आरे मेट्रो कारशेड को लेकर हमारी भूमिका स्पष्ट है। यह लड़ाई आदित्य बनाम सीएम नहीं है, यह शहर पर्यावरण बनाम विनाश का मसला है। हमारी पार्टी के नगरसेवक और   विधायक इसके खिलाफ थे। हमारा मेट्रो को लेकर विरोध नहीं है, विरोध आरे में कारशेड बनाने को लेकर है। वहां पूरा इकोसिस्टम है। निरी ने ओशिवरा, बैक-बे और कांजूर में  कारशेड बनाने की रिपोर्ट दी थी। उसे नहीं माना गया। आरे में जब पेड़ काटने का प्रस्ताव वृक्ष प्राधिकरण में लाया गया तो भी हमने उसे निरस्त किया।

आपने 10 रुपए में भरपेट भोजन का वादा किया है, यह कैसे संभव होगा?
हमने ऐसा कोई वादा नहीं किया जो पूरा नहीं हो सके। हमने चांद को धरती पर लाने का वादा नहीं किया है। हम केंद्रीयकृत किचन लाएंगे और इससे महिला बचत समूहों को रोजगार  मिल सकेगा। 

मुंबई की नाइट लाइफ को लेकर आप आग्रही रहे हैं
इस पर सीएम साहब के सिग्नेचर होना बाकी है। हम सब रात-दिन काम करते हैं, लेकिन रात को भूख लगे तो केवल फाइव स्टार होटल ही खुले मिलते हैं। मुंबई में नाईट लाइफ  शुरू हुई तो 10 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। लंदन में नाइट लाइफ की इकोनॉमी 5 बिलियन पौंड है।

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