बाढ़ और उससे उठते सवाल

बिहार और उत्तर प्रदेश बाढ़ की भयावह चपेट में है। इस बार मौसम विभाग ने विगत वर्षों की अपेक्षा कम बारिश की भविष्यवाणी की थी, परंतु इंद्रदेव की कृपा ने उसे खारिज कर  दिया। अब जबकि बारिश पूरे देश के अधिकांश क्षेत्रों में कीर्तिमान बना रही है और जहां बारिश हो रही है छक कर हो रही है, तो आवश्यक है कि उससे निपटने की तैयरियों और  उसके होने के कारणों दोनों पर देशव्यापी विचार हो और ऐसा कुछ समाधान निकले कि शासन यह कहकर संतोष न करे कि ऐसा अमेरिका में भी होता है या मुंबई या और शहरों में  होता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार हमने और दुनिया ने प्रकृति का इतना अनुचित संदोहन किया है कि ऋतुचक्र ही प्रभावित हो रहा है। गर्मी में ज्यादा गर्मी, सर्दी में ज्यादा सर्दी  और बारिश में ज्यादा बारिश और कुछ ही समय में इतनी धुंआधार बारिश कि हर जगह पानी ही पानी हो जाए। इसका मुकाबला कई स्तर पर करना होगा। पहला तो इस अवस्था  का सामना कैसे किया जाए, इसके लिए अल्पकालीन और दीर्घकालीन दोनों उपायों पर विचार करना होगा। अल्पकाल में होने वाली व्यवस्थाओं में लोगों को सुरक्षित रखना और उन्हें  समय-समय पर भोजन, जल और राहत की तात्कालिक व्यवस्था करना शामिल है। जिस तरह की बदहवासी बिहार में दिखी। लोग पानी के लिए तरसते नजर आए यह सूचक है उस  दुर्दशा की, जो अपर्याप्त पूर्व तैयारी और की गई कमी दर्शाता है। मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने भले ही यह कहा कि अमेरिका में भी ऐसा होता है, परंतु क्या अमेरिका जैसी जल निकासी की व्यवस्था पटना में या हमारे देश के कई शहरों में है। इसका भी जवाब उन्हें देना चाहिए। क्या प्लास्टिक के उपयोग से पर्यावरण का जो सत्यानाश हो रहा है। पानी नहीं  निकल पा रहा है, ऐसा अमेरिका में है। वहां तो बारिश हुई, बाढ़ आई और पानी दूसरे दिन गायब। हमारे यहां तो टिका रहता है। उसे निकालने में श्रम और धन दोनों खर्च होता है,  तो हमें अपने इन व्यवस्थाओं को मसलन जल निकासी आदि को अद्यतन करना होगा और जनता को भी उन उत्पादों से तौबा करने के लिए जागरूक और प्रेरित करना होगा, जो  ऐसे साधनों को भाठ कर बाढ़ के दौरान इस स्थिति को और गंभीर बना देते हैं और उसके बाद तमाम तरह के कष्ट और अपव्यय का कारण बनाती है और तीसरी बात प्रकृति   संतुलित जीवन पर जोर, जल,जंगल और जमीन के संरक्षण और सवंर्धन पर जोर और तीसरी उन उत्पादों के प्रयोग और ऐसी लापरवाहियों पर सख्त प्रतिबंध, जो पर्यावरण को हानि  पहुंचा रही है। यह समस्या बिहार की ही नहीं, पूरे देश का यही सूरतेहाल है। एक और बात जो की जा सकती है, जिसमें समय श्रम और धन थोड़ा ज्यादा लगेगा ऐसी कोई व्यवस्था  जो बारिश के समय अफराद पानी का संचय कर सके और इसे उन इलाकों तक पहुंचाया जा सके जो सतत् पानी की कमी झेल रहे हैं। इस दिशा में हमारी केंद्र सरकार भी हर संभव  प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री ने जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। हमें उन सदाबहार जल संचय के पुराने तौर-तरीकों को भी पुनर्जीवित करना होगा, जो आधुनिकता के इस  युग में कालवाह्य हो रहे हैं, भठ रहे है। जैसे कुएं और तालाब उन्हें पुन: जीवित करना होगा।

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