अब अर्थव्यवस्था सुधारेगी पाक की सेना

सेना का काम देश की सीमाओं की रक्षा करना होता है देश चलाने का कार्य नागरी सरकारें करती हैं, परंतु पाक सेना को देश चलाने का चश्का काफी पुराना है। अब लगता है कि आर्थिक रूप से  बेहाल पाकिस्तान की खस्ता हालत अर्थव्यवस्था से होने वाले पीड़ा से सेना भी अछूती नहीं है।  उनके खर्चे में कतरव्योंत हो रही है और जिससे उनके सेनाध्यक्ष बाजवा की बेचैनी बढ़ रही है।  मिली जानकारी के अनुसार उन्हें देश को इस आर्थिक गर्त से निकालने में इमरान के नेतृत्व की सरकार पर कम भरोसा ही है। इसलिए साहेब खुद देश यानी पाक के उद्यमियों से मिल रहे हैं और  अर्थव्यवस्था में कैसे ऊर्जा का संचार हो। इस पर विमर्श कर रहे हैं। जब-जब ऐसे विमर्श में तेजी आई है उसका परिणाम पाकिस्तान में सैनिक शासन रहा है। क्या एक बार फिर आर्थिक रूप से  बदहाल, दुनिया में आतंकिस्तान के रूप से कुख्यात और इस कारण से दुनिया से अलग-थलग और लगभग अछूत बन चुका पाक फिर उसी दिशा में जाने की ओर कदम तो नहीं बढ़ा रहा है।  संकेत तो कुछ ऐसे ही आ रहे हैं। वह कब होता है, पता नहीं। परंतु इतना तय है कि बाजवा के सेना के कार्यों के अलावा अर्थव्यवस्था और कूटनीति और अन्य दखलंदाजियों से इमरान का दर्द
और समस्या बढ़ना तय है।

पुराने ढर्रे कर रहे कांग्रेस का बेड़ा गर्क
कंग्रेस अपनी अब तक की यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। लोकसभा में दूसरी बार ऐतिहासिक पटखनी के बाद उम्मीद थी कि कम से कम अब उसे अपनी दुर्दशा का भान होगा, परंतु  वैसा हो रहा है ऐसा कदापि नहीं लगता। महाराष्ट्र में उसे उम्मीदवारों का अकाल है, जबकि हरियाणा में टिकट वितरण में गड़बड़ घोटाले की आरोप खुलेआम लग रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष के सामने  गुहार लगाए जा रहे हैं। नारेबाजी हो रही है। एक गुट दूसरे पर पार्टी को डुबोने का अरोप लगा रहा है। हर जगह गुटवाद चरम पर है। कुल मिलाकर साफ है कि कांग्रेस अपने पिछले खराब प्रदर्शन  से कोई सबक लेती नहीं दिखाई दे रही है और न ही उसकी कार्यशैली में कोई बदलाव आ रहा है। पार्टी आज भी इस बात पर गंभीरता पूर्वक विचार करने को तैयार नहीं है कि क्या कारण है कि  वह कई राज्यों में दशकों से सत्ता में नहीं आ रही है और क्यों वह कई राज्यों में अपने आपको जिंदा रखने के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बैशाखियों का सहारा लेने के लिए मजबूर  है।  कहीं उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं, तो कहीं नेताओं के अहं हास्यास्पदस्थिति पैदा कर रहे हैं। मुंबई में तमाम ऐसे नताओं को टिकट दिया गया है, जिन्हें शायद उनके जिले के लोग ही ठीक से  नहीं जानते हैं। आज जो पार्टी की हालत है उसे देखते हुए लग रहा था कि ऐसे में वह उम्मीदवारों को ठोंक बजाकर चयन करेगी, परंतु जैसा दिख रहा है वह दूर की कौड़ी नजर आती है। कांग्रेस  भले ही मिट जाए पर बदलेंगी नहीं की शैली ही अपनाती दिख रही है। वैसे भी भाजपा के विजयी रथ के सामने कांग्रेस न महाराष्ट्र न हरियाणा में कोई चुनौती देती प्रतीत हो रही थी और अब  जिस तरह से टिकट दिए जा रहे हैं या दिए गए हैं, जैसे आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं उससे साफ है कि पार्टी इन राज्यों मेंपिछले विधान सभा चुनावों से ज्यादा दुर्गति का सामना करेगी। कारण  पुराना ढर्रा और रीति-नीति फ्लॉप है। इसे कांग्रेस नेतृत्व समझ ही नहीं पा रहा है, तो फ्लॉप रीति-नीति और उसकेकार्यकर्ता क्या परिणाम देंगे? यह दिन के उजाले की तरह साफ है। बेड़ा गर्कहोता दिख रहा है ।

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