राष्ट्रहित सर्वोपरि

हरिद्वार के पतंजलि योगपीठ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के धर्म जागरण विभाग द्वारा आयोजित स्वाध्याय संगम शिविर में बोलते हुए संघ के सर संघचालक डा. मोहन भागवत ने   कहा कि हमें इजरायल जैसे देश से सीख लेनी चाहिए। इजरायल ने सदियों की गुलामी के बाद भी अपनी संस्कृति और धर्म को नहीं छोड़ा। उसने अपने धर्म और संस्कृति के लिए  संघर्ष किया और उसे बचाए रखा। उन्होंने उम्मीद जताई कि हमारी युवा पीढ़ी ऋषि परंपरा का पालन करते हुए अपने धर्म और संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम करेगी। भागवत ने  कहा कि हमारे साधु-संत संस्कृति को बचाने के लिए हमेशा आगे आए हैं और उन्होंने अपने घर बार त्याग कर भारतीयता की रक्षा की। साथ ही ऋषि परंपरा को जीवित बनाए रखा   है। उन्होंने स्वामी रामदेव की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने पतंजलि के जरिए भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण कार्य किया है। स्वामी रामदेव ने योग  को जन-जन तक पहुंचाया है और पूरी दुनिया आज भारत की ओर देख रही है। दुनिया में योग सीखने की होड़ लगी हुई है। स्वामी रामदेव ने मोहन भागवत और संघ की तारीफ  करते हुए कहा कि आरएसएस ने हमेशा भारतीय संस्कृति की रक्षा की है। संघ प्रमुख ने कहा कि हमारी धार्मिक संस्थाएं और साधु संत जिस तरह से ऋषि परंपरा का निर्वहन कर  रहे हैं, उससे एक दिन भारत विश्व गुरु जरूर बनेगा। भारत वर्ष लंबे समय तक गुलाम रहा और हम पर शासन करने वालों ने हमारे यहां व्यापक स्तर पर धर्म परिवर्तन करवाया,  इसलिए हमारे कई भाई विभिन्न धर्मों में शामिल हो गए। उन्होंने साधु-संतों से अपील की कि वे अपने उन हिंदू भाइयों के बीच जाएं, जो विवशता के कारण अन्य धर्मों में चले गए  और उनको फिर से स्वधर्म में वापस लाएं। वे उन्हें जबरन नहीं, बल्कि प्यार से समझा बुझा कर अपने धर्म पर वापस लाएं और भाईचारे का माहौल बनाएं। भागवत ने कहा कि साधु  समाज हिंदू संस्कृति के उत्थान के लिए अपने जीवन को त्याग कर भगवा धारण कर राष्ट्र के निर्माण में लगा हुआ है। भागवत ने साधु-संतों से अपील की कि वे पर्यावरण की रक्षा   के लिए भी आगे आएं। हिंदू धर्म में अनादि काल से पर्यावरण को पूजा जाता रहा है, परंतु विश्व में पर्यावरण पर आज संकट छाया है। पर्यावरण की रक्षा साधु-संत बहुत कुछ कर  सकते हैं और वे सदियों से करते भी आए हैं। हम प्रकृति के पुजारी हैं, हमने प्रकृति को मां माना है, हमने तुलसी को मां माना है, हमने वट वृक्ष की पूजा की है, हमने पीपल को  पूजा है, हम संस्कृति को बचाने का काम करते हैं। जल को जीवन के रूप में देखते हैं। भागवत ने कहा कि आज गाय, गंगा, वृक्ष इन सब को भी संरक्षित करने की आवश्यकता है।  यह हमारा भविष्य है, हमारी जो संतति है उसका भविष्य है, उस संतति को आगे लेकर चलना और उस संतति के लिए वतर्मान में चिंतित रहना, उस चिंतित विषय को चिंता में बदलना और समाज के अंदर इस चिंता का जन जागरण स्थापित करना यह हम सबका कर्तव्य हो जाता है। देश एक भौगोलिक खंड है। देश में रहने वाले ही राष्ट्र कहलाते हैं। राष्ट्र  मनुष्यों के समूह का नाम है। मनुष्य शरीर, मन और आत्मा के संयोग को कहते हैं अत: तीनों के संतुलित विकास को ही मनुष्य एक राष्ट्र की उन्नति मानते हैं। राष्ट्र के कल्याण  के लिए मनुष्य को तीनों अंशों शरीर, मन और आत्मा की उन्नति की आवश्यकता है। जब व्यक्ति उन्नत और श्रेष्ठ हो तो राष्ट्र स्वयं उन्नत हो जाता है। संघ प्रमुख इजरायल का   उदाहरण दे यही समझा रहे हैं कि जिस तरह इजरायलियों ने अपनी संस्कृति और धर्म को संभाले रखा, हमें भी अपनी संस्कृति और धर्म को संभालना चाहिए। आज की सबसे बड़ी  चुनौती यही है कि युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति और धर्म से कटती चली जा रही है। इसी कारण जहां परिवार कभी भारतीय संस्कृति का केंद्र बिंदु था, वहां व्यक्ति केंद्र बिंदु होता चला  जा रहा है। हम की जगह मैं के लेने से जहां परिवार टूट रहे हैं, वही नैतिक पतन हो रहा है। भौतिक सुख- सुविधा को प्राथमिकता देने के कारण त्याग और परमार्थ की परंपरा कमजोर होती जा रही है। वर्तमान में मनुष्य के शारीरिक विकास को प्राथमिकता दी जा रही है और आर्थिक विकास की अनदेखी होने के कारण राष्ट्र का विकास भी अंसतुलित हो  रहा है। संघ प्रमुख संतों को जहां उनके कर्तव्यों के बारे में सचेत कर रहे हैं, वहीं युवा पीढ़ी को इजरायल से प्रेरणा ले अपनी संस्कृति और धर्म से जुड़ने की बात कह रहे हैं। संघ  प्रमुख मोहन भागवत जो कह रहे हैं, उसे गंभीरता से ले उस राह पर चलने में ही राष्ट्र का भला है।

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