सकारात्मक संकेत फिर भी अभी बहुत दूर चलना ह

चीनी राष्ट्रपति और हमारे प्रधानमंत्री के मध्य अनौपचारिक शिखर वार्ता समाप्त हो चुकी है। चीन राष्ट्रपति स्वदेश वापस जा चुके हैं, परंतु जिस तरह के समाचार इस शिखर वार्ता के  बाद सुर्खियों में आए हैं, उससे यह साफ है कि चीन भी अब हमारे संदर्भ में अपनी नीतियों में बदलाव लाने को इच्छुक है और जिस चीन का दर्शन हम डोकलाम के पूर्व करते थे,  जिसमें धमकी और एक अजीब तरह की पहलवानी अ€खड़पड़ की झलक हमें मिलती थी, वह अब नहीं दिख रही है। कारण डोकलाम में हमारे कड़े रुख ने और उस पर शांत परंतु दृढ़  प्रतिकार ने चीन को यह एहसास करा दिया कि जिस भारत का वह डोकलाम के बाद से लेकर आज तक सामना कर रहा है। वह 1962 के दौर के भारत से हर दृष्टि से जुदा है। अर्थव्यवस्था, सामरिक क्षमता, अंतर्राष्ट्रीय सम्मान और मान्यता और ख्याति में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है। एक नई धमक बनी है और आज दुनिया एक नई आस से हमारी ओर  देख रही है और जिसे चीन अच्छी तरह समझ रहा है। पाक के साथ मिलकर वह सतत् हमारे काम में अडंगा डालता आया है, परंतु उसे कभी वांछित सफलता नहीं मिली उलटा पूरी  दुनिया के सामने उसे नंगा होना पड़ा और अंतत: उसे अपनी नीति में बदलाव के लिए बाध्य होना पडा। मौलाना मसूद अजहर का मामाल हो या हाल में हमारे द्वारा आर्टिकल 370  हटाने का मामला हो उसे दोनों मुद्दों पर किरकिरी उठानी पड़ी। दुनिया हमारे साथ रही और वह तथा पाक एक तरफ रहे। लगता है उक्त झटकों और डोकलाम में पीछे हटने के बाद  चीन को पाक प्रेम में उसकी रीति-नीति का अंधा समर्थन आत्मघाती यह समझ में आ रहा है। यह यथार्थ कि पाक का अंधा समर्थन उसे भी दुनिया में आतंकिस्तान के समर्थक के   रूप में एक नई पहचान दिला रहा है। व्यापार को लेकर आज जो उसकी दुनिया में स्थिति है और दुनिया के छोटे देशों को कर्जदार बनाकर उसकी आड़ में अपनी विस्तारवादी नीतियां  लागू करने की उसकी मनसा उजागर होने के साथ-साथ उसे मिले कड़े प्रतिकार के कारण आज जो दुनिया में उसकी संदिग्ध छवि है, यह सब भी उसे हमारे साथ नरम नीति और  रूख अपनाने को बाध्य कर रहा है। कारण हमारे साथ व्यापार में उसे लाभ ही लाभ है और आज वह इसे गंवाने की स्थिति में नहीं है, परंतु इसके लिए उसका बैलेंस एक तरफा  उसकी ओर न रहे, इसका ध्यान उसे रखना होगा और हमारी ओर से इसे लेकर उस पर निरंतर दबाव बढ़ रहा है, जिस पर उसे जरूर ध्यान देना होगा। उक्त तमाम कारण हैं, जो चीन को नरम करते हुए हमें लेकर उसके द्वारा अब तक अपनाई गई नीति पर पुनर्विचार का आवाहन कर रहे हैं। शायद यही कारण है कि उसके राष्टाध्यक्ष ने इस अनौपचारिक  शिखर वार्ता में कश्मीर मुद्दे पर कुछ कहने से परहेज किया और वुहान से शुरू सकरात्मक बयार धीरे-धीरे मजबूत हो रही है, जिस पर चेन्नई की शिखर बैठक उसे और आगे बढ़ाने  का काम करेगी, इसमें कोई दो राय नहीं है। यह एक नये युग की शुरुआत का द्योतक है। अभी इस पर चीन को विश्वास का और सदा चढ़ना होगा। कारण चीन ने पहले भी कई  बार सकारात्मक संकेत देकर पल्टी मारी है। अभी हममें और चीन की सोच में विश्वास की स्थाई बयार बहाने के लिए बहुत कुछ किया जाना जरूरी है। कारण हम नहीं बल्कि चीन  हमारे एक भू-भाग पर काबिज है और पीओके में जो कुछ उसने चीन पाक कारिडोर के तहत किया हमारी उस पर घोर आपत्ति है और यह चीन ही है, जिसे हमारी सीमा में उसकी  धरती दिखती है और वह घुसपैठ करता रहता है। इसके अलावा भी वह आतंकिस्तान का सबसे बड़ा समर्थक है और उसकी नजर से हमारे मुद्दे देखने का आदी है। उसे इन सब मुद्दों  पर ईमानदारी से हमारी बातों को सुनना और हमारे दावों को मान्य करना होगा। हमारी जगह खाली करनी होगी, तभी अन्य युग की राह पर स्थाई रूप से चल सकेंगे। प्रधानमंत्री भी  इसे शुरुआत ही मान रहे हैं। कारण वे भी जानते हैं कि ड्रैगन पर बहुत जल्दी यकीन नहीं किया जा सकता।

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