उजड़ गई सोनपुर मेले का रौनक

हाजीपुर
ऐतिहासिक गजग्राह युद्ध की भूमि सोनपुर में विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला अब पशु मेला की जगह थियेटर मेला बन गया है। 2003 में पशु-पक्षियों की बिक्री पर लगी रोक के बाद साल दर साल  मेले की रौनक उजड़ती चली गई। कभी आठ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगने वाला यह मेला राज्य सरकार की शिथिलता के कारण मात्र दो वर्ग किलोमीटर में सिमट गया है। दो दशक पहले हाजीपुर के कोनहारा घाट से सारण के पहलेजा घाट तक फैले सोनपुर मेला घूमने में पर्यटकों को तीन से चार दिन लग जाते थे।
हर साल हजारों विदेश पर्यटक मेला देखने आते थे। अब पांच से छ: घंटे  में सोनपुर मेला देखने का कोरम पूरा हो जाता है। सिर्फ कार्तिक पूर्णिमा स्नान के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश से जुटने वाले लाखों के भीड़ ही इस मेले को एहसास कराती है कि अब भी मेला  दा है। लालू और अनंत सिंह का घोड़ा होता था मेले के आकर्षण का केंद्र पंजाब की गाय-बैल, आसाम और पश्चिम बंगाल की भैंस और उत्तर भारत के कई राज्यों के घोड़े और हाथी से कभी सोनपुर मेला गुलजार होता था। अब सिर्फ सारण जिले के कुछ लोग गाय और घोड़ा का बाजार लगाते हैं। सोनपुर से ही पहली  बार विधायक बने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कई वर्षों तक अपने घोड़े पवन को यहां भेजकर मेले की रौनक बढ़ाई। बाद में मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह का घोड़ा और घुड़दौड़सोनपुर मेला के चर्चा का केंद्र हुआ करता था। अनंत सिंह मेले में अपना हाथी, घोड़ा, गाय और सांड लेकर पहुंचते थे, लेकिन इस बार जेल में बंद होने के चलते वह मेले में नहीं होंगे। नब्बे  के दशक में सोनपुर के बड़े जमींदारों में गिने जाने वाले बच्चा बाबू का घोड़ा, हाथी, शेर, बाघ, पशु-पक्षी सोनपुर मेला के आकर्षण का बड़ा केंद्र होता था। उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री रहे वर्मा जी  अपने हाथियों के साथ सोनपुर मेले में एक हफ्ते तक डेरा डालते थ।

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