राज्य में नया अध्याय

राज्य में पिछले लगभग एक महीने से ज्यादा समय से चल रही सियासती उठापटक शिवसेना पक्ष प्रमुख उद्धव ठाकरे के महाविकास आघाड़ी का नेता चुने जाने के साथ ही समाप्त हो  गई है। गुरुवार को उद्धव ठाकरे की महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ के साथ राज्य में एक नए युग की शुरुआत हो जाएगी। पुरानी मान्यता है कि राजनीति, यूद्ध और प्यार में  सब कुछ जायज है, जो इस बार महाराष्ट्र में पूरी तरह चरितार्थ हुई है। आज से छह माह पहले कोई भी राजनीतिक विश्लेषक यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि शिवसेना,  रांकापा और कांग्रेस मिलकर सरकार बनाएंगे। भाजपा और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा था और जनता ने उन्हें अपना पर्याप्त समर्थन भी दिया था। परंतु मुख्यमंत्री पद को लेकर  शुरू हुए विवाद ने अंतत: दोनों को अलग कर दिया। साथ ही भाजपा का अजीत पवार को लेकर सरकार बनाने का प्रयास भी नाकाम हो गया, क्योंकि अजीत पवार पर्याप्त संख्या बल  नहीं जुटा पाए और अपने चाचा शरद पवार से सियासती दांवपेच में मात खा गए। अब जबकि तीन पार्टियों का यह गठजोड़ सामने आ चुका है। राज्य के इतिहास में पहली बार हिंदु  हृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे के पुत्र उद्घव ठाकरे इस गठबंधन के मुखिया के रूप में महाराष्ट्र की सरकार का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। अब सबकी निगाह इस ओर है कि आगे  यह सरकार कैसे चलती है, क्योंकि शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा विचारधारा के तौर पर हमेशा एक-दूसरे की विरोधी रही है। न्यूनतम साझा कार्यक्रम को आधार बनाकर आगे बढ़ने  को सन्नध यह गठजोड़ आगे कैसे चलता है। इस पर महाराष्ट्र भाजपा की नजर तो रहेगी ही, पूरे देश की भी रहेगी। कारण यह अभिनव प्रयोग है, जो महाराष्ट्र में होने जा रहा है  और इस समय होने जा रहा है, जब महाराष्ट्र अपने इतिहास की सभी बिकट कृषि संकट का सामान कर रहा है। यानी सरकार को सबसे पहले उसमें दो-दो हाथ करना है और देश में  राज्य की जो अर्थव्यवस्था के इंजन के रूप में ख्याति है, उसे बरकरार रखते हुए उसे इस तरह गतिमान करना है कि जो भारत सरकार देश को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था  तक पहुंचाने का लक्ष्य है उसमें राज्य अपनी भूमिका भलीभांति निभा सके।
राज्य की इस सियासती उठापटक ने यह साबित कर दिया कि राजनीती में कुछ भी संभव है। लोग आज की चिंता करते हैं। विचारधारा, प्रतिबद्धता गौण हो गई है और इससे कोई   दल अछूता नहीं है। पहली बार सरकार का नेतृत्व ठाकरे परिवार का सदस्य करने जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इसे शिवसेना कार्यकर्ता आह्लादित है। साथ की कांग्रेस और  राकांपा के तमाम दिग्गज भी अपनी-अपनी तरह से इस सरकार के संचालन में अपना योगदान देने के लिए तैयार है। इस पूरे घटनाक्रम में रांकापा प्रमुख शरद पवार एक बार फिर  राज्य के मजबूत क्षत्रप और देश के एक बड़े नेता के रूप में जो उनकी ख्याति है, उसे बरकरार रखने में कामयाब हुए हैं। उन्होंने दिखा दिया कि उम्र के आठवें दशक में भी उनकी  राजनीतिक पकड़ और समझ आज भी कमाल की है। गुरुवार के शपथग्रहण के साथ ही राज्य में नए दौर की शुरुआत हो जाएगी। रही बात भाजपा की तो उसने एक मजबूत विपक्ष  की भूमिका के लिए अपने को तैयार करना शुरू कर दिया है। अब देखना यह है कि राज्य की राजनीति का यह प्रयोग राज्य की जनता की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने  में कितना खरा उतरता है। कारण किसी भी सरकार का मूल्यांकन आखिर में उसके द्वारा किए गए जनकल्याणकारी कार्यों से ही होता है।

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