सबका साथ सबका विकास की बात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरसीईपी से न जुड़ने का, जो फैसला लिया है और उसका जिस तरह से हमारा उद्योग जगत स्वागत कर रहा है, उससे साफ है कि यदि मौजूदा स्वरूप में   हम उससे जुड़ जाते तो वह घाटे का सौदा होता। प्रधानमंत्री द्वारा यह किया जाना अभिनंदनीय है और उस प्रधानमंत्री से जिसने मेक इन इंडिया सहित कई क्रांतिकारी कदमों से  हमारी अर्थव्यवस्था को और मजबूत करने का बीड़ा उठाया हुआ है, यह अपेक्षित ही था। वैसे भी जिस सेटअप में चीन शामिल हो, उसमें शामिल होने के पहले उस पर दस बार सोचना हमारे लिए लाजिमी हो जाता है। कारण चीन जैसा आत्मकेंद्रित और आत्ममुग्ध तथा अविश्वसनीय देश इस धराधाम पर कम है। वह एक ही बात पर कई स्टैंड लेने के लिए  जाना जाता है और जैसा हम जम्मू-कश्मिर पर उसकी भूमिका में सतत बदलाव के रूप में देख रहे है। चीन आज इस दौर में हमारी आर्थिक, कूटनीतिक, सामरिक और हर तरह की   बढ़ती धमक से वाकिफ है। हमसे डीलिंग में भी सावधान हुआ है। अब गीदड़भभकी और आंख तरेरना बंद है, परंतु रंग बदलना जारी है। एक बार जम्मू-कश्मिर उसे आंतरिक मामला  लगता है और दूसरी ओर उसे अपनी संप्रभुता पर दखल का दिवा स्वप्न आता है, तो ऐसे दोस्त के साथ किसी भी करार में शामिल होने से पहले भारत का सतर्क रहना स्वाभाविक है  और मोदी युग में तो ऐसी अनदेखी कदापि नहीं होगी, जिससे हमारा कोई नुकसान हो। प्रधानमंत्री के न करने के बाद अब चीन फिर नया सुर बजा रहा है। अब उसे हमारी  आवश्यकता उसमें जरूरी लग रही है। अब वह और अन्य सदस्य हमारी शंका दूर करने को भी उतावले हैं। शुभ संकेत है कि हम किसी भी ग्रुपिंग में तभी शामिल होंगे, जब वह  हमारे हितों के अनुकूल हो और किसी का भी अहित न हो। हमारी केंद्र सरकार विदेश नीति में भी सबका साथ सबका विकास के सिद्धांत को मानती है और ऐसा हमारे प्रधानमंत्री एक  नहीं हजार बार कहते रहते हैं।

अनुचित टकराव

पोलिस और वकील हमारी कानून व्यवस्था के दो प्रहरी है। एक कानून व्यवस्था की सुचारू क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार है और दूसरा यह देखता है कि कानून सही तरह से  व्याख्यायित हो, जिससे वादी या प्रतिवादी को सही न्याय मिल सके। दोनों हमारे प्रशासन की न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है और यदि दोनों में टकराव होगा तथा उसमें मारपीट, हाथापायी और धरना-प्रदर्शन की स्थिति आ जाए तो सही नहीं है। कारण यदि इनका ऐसा हाल होगा तो आम आदमी कहां जाएगा। उसका क्या होगा? तीस हजारी कोर्ट परिसर में जो कुछ हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण है और जैसा उसके बाद हो रहा है वह भी ठीक नहीं है। न्यायालय और सरकार दोनों इस मामले को देख रहे है। इसका शीघ्र और यथोचित  समाधान अपेक्षित है और वह समाधान ऐसा होना चाहिए, जो ऐसी स्थितियों के लिए प्रतिरोधक का काम करे। कारण जिनके ऊपर कानून व्यवस्था लागू करने की जिम्मेदारी है, जो   कानून की सही व्याख्या प्रस्तुत कर न्याय में सहयोगी बनते हैं यदि वही आपस में इस हद तक भिड़ेंगे, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे और दो-तीन दिन से टकराव की स्थिति  बनी रही, तो उसे कदापि सही नहीं ठहराया जा सकता। उम्मीद है कि इसे शांत करने और समाधान खोजने में लगी न्यायपालिका और सरकारी तंत्र के लोग ऐसा समाधान निकालेंगे,  जिसे ऐसी परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार लोगों को सबक मिलेगा और ऐसी स्थिति दुबारा नहीं होगी, कारण व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंगों में इस तरह का टकराव किसी भी दृष्टि से  सही नहीं है।

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