संविधान की मर्यादा में करें काम: राष्ट्रपति

हर परिस्थिति के लिए संविधान सम्मत रास्ते उपलब्ध

Ramnath Kovind
नई दिल्ली
वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर, संविधान-सम्मत प्रक्रियाओं का पालन करने को संवैधानिक नैतिकता कासार-तत्व करार देते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंगलवार को कहा कि  देश में हर प्रकार की परिस्थिति का सामना करने के लिए संविधान सम्मत रास्ते उपलब्ध हैं, इसलिए संविधान की मर्यादा, गरिमा और नैतिकता के अनुरूप काम करें। उन्होंने कहा  कि वर्तमान समय में हम सभी को संवैधानिक मूल्यों, ईमानदारी को अपनाते हुए भय, प्रलोभन, पक्षपात, राग द्वेष एवं भेदभाव से मुक्त रहकर काम करने की आवश्यकता है। ऐसे  में संविधान निर्माताओं की भावना को शुद्ध अंत:करण से अपनाना चाहिए। संविधान के अंगीकार के 70 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद के केंद्रीय कक्ष में आयोजित लोकसभा एवं  राज्यसभा संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि भय, प्रलोभन, राग-द्वेष, पक्षपात और भेदभाव से मुक्त रहकर शुद्ध अंत:करण के साथ कार्य करने की भावना  को हमारे महान संविधान निर्माताओं ने अपने जीवन में पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपनाया था। उनमें यह विश्वास जरूर रहा होगा कि उनकी भावी पीढ़ियां, अर्थात हम सभी  देशवासी भी, उन्हीं की तरह, इन जीवन-मूल्यों को, उतनी ही सहजता और निष्ठा से अपनाएंगे। उन्होंने कहा कि आज इस पर हम सबको मिलकर आत्म-चिंतन करने की जरूरत है।  राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान के अनुसार, प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह संविधान के आदर्शों और संस्थाओं का आदर करें, आजादी की लड़ाई के आदर्शों का पालन करें,  ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध हैं तथा हमारी संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिक्षण करें। कोविंद ने कहा कि हमारे देश  में हर प्रकार की परिस्थिति का सामने करने के लिए संविधान सम्मत रास्ते उपलब्ध है। इसलिए हम जो भी कार्य करें, उसके पहले यह जरूर सोचे कि क्या हमारा कार्य संवैधानिक  मर्यादा, गरिता और नैतिकता के अनुरूप है। संविधान के आदर्शों के प्रति संकल्पबद्ध रहने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास है कि इस कसौटी को ध्यान में रखकर अपने  संवैधानिक आदर्शों को प्राप्त करते हुए हम सब भारत को विश्व के आदर्श लोकतंत्र के रूप में सम्मानित स्थान दिलाएंगे। कोविंद ने कहा कि 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में  अपने अंतिम भाषण में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था कि संविधान की सफलता भारत के लोगों और राजनीतिक दलों के आचार पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि हमारे  संविधान निर्मताओं में यह विश्वास जरूर रहा होगा कि उनकी भावी पीढ़ियां, अर्थात हम सभी देशवासी भी, उन्हीं की तरह, इन जीवन-मूल्यों को, उतनी ही सहजता और निष्ठा से  अपनाएंगे। आज इस पर हम सबको मिलकर आत्म-चिंतन करने की जरूरत है।

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