दिल्ली और मुंबई का संदेश

अभी एक अध्ययन की रपट आई है। दुनिया के एक बड़े क्षेत्र के डूब जाने का खतरा है, क्योंकि समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, उसमें हमारी मुंबई का भी समावेश है, जबकि दूसरी खबर  दिल्ली से संबंधित है। जहां दिवाली और पराली ने वहां की हवा इतनी खराब कर दी है कि वहां स्वास्थ्य के लिए आपातकाल घोषित है। इसमें से एक देश की राजधानी है और दूसरे  देश की आर्थिक राजधानी है और इसके लिए कोई दैवी शक्ति नहीं, बल्कि हम यानी हांड मांस के मानव जिम्मेदार है। पराली न जलाएं उसका ऐसा उपयोग करें जिससे आस पास की  आबोहवा प्रदूषित न हो। यह हर साल कहा जाता है और तमाम ऐसे विकल्प मौजूद हैं जिसे अपनाकर करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य के साथ होने वाले खिलवाड़ से बचा जा सकता है।  प्रधानमंत्री से लेकर बड़े-बड़े पर्यावरण विद अनुरोध कर चुके हैं, परंतु हम हैं कि मानते नहीं। वही हाल मुंबई का है। मैंग्रोव बचाओं की आवज चारों ओर होती है, परंतु उस पर कब्जा  करने का उसे मिटाने का कार्य बदस्तूर जारी है और ऐसा करने के आरोप के लपेटे में जनप्रतिनिधि तक हैं और यह हाल मुंबई और दिल्ली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हमारे लोगों  ने पूरे देश में जिस तरह प्रकृति का चीर हरण किया है, जिस तरह तय मापडंडों की अनदेखी की गई है। जिस तरह जमीन और पैसे की पिपासा में जगलों, पहाड़ों का खात्मा किया  जा रहा है। कोई लकड़ी के लिए, कोई पत्थर के लिए और कोई किसी और के लिए जैसा कर रहा है, उसे वैसा ही उसे भरना पड़ेगा और यदि वह नहीं भरेगा, तो उसकी भावी-पीढ़ी को  भरना पड़ेगा, इसका भान करते हुए कम से कम अब हम सबको काम पर लगने की जरूरत है और जो भी व्यक्ति या संस्थान वह चाहे बड़ा हो या छोटा यदि ऐसा कुछ करता पाया  जाता है, जो पर्यावरण के संतुलन के विपरीत है। या प्रदूषण बढ़ाता है, तो उस पर कड़ी कार्रवाई करने की भी जरूरत आ पड़ी दिखाई देती है। कारण जागरण, चेतावनी, समझाइश  बहुत हो चुका। जब वे लोग इसमें लिप्त हो जिन्हें जानकार कहा जा सकत है और वे पर्यावरण का प्रकृति का अनुचित संदोहन सिर्फ इसलिए करते हैं कि उनकी जमीन की, पैसे की  क्षुद्र पिपासा दूर हो सके, तो उन पर सख्त और उदाहरणीय कार्रवाई वक्त की मांग है। कारण ऐसे लोग जो कर रहे है वह देश और समाज की घात करने वाला काम है। जिस तरह  की रिपोर्ट आ रही है जैसी आशंका, पर्यावरण विद और जानकार व्यक्त कर रहे हैं यदि उस पर अभी भी काम नहीं किया गया, सख्ती नहीं बरती गई, सुधारारात्मक कदम नहीं उठाए   गए, तो वह दिन दूर नहीं जब हम कुछ करने लायाक नहीं बचेंगे। हमसे तो ज्यादा समझदार और विद्वान हमारे पूर्वज थे। उन्होंने प्रकृति का इस तरह से संदोहन किया। जिससे उसका बैलेंस बना रहे। हम तो उसका बैलेंस बिगाड़ ही नहीं रहे, बल्कि उसे ऐसे विनाश की ओर ले जा रहे हैं, जहां आदमी का जीना मुहाल हो रहा है। दिल्ली और मुंबई में रहने   वालों की ही नहीं और कई शहरों में रहने वालों की आयु इसलिए घट रही है कि उन्हें शुद्ध हवा सांस लेने के लिए नहीं है। लोग इसलिए बीमार हो रहे हैं कि शुद्ध पानी नहीं है, जिसे  पी सकें और कहीं बाढ़ नहीं जीने दे रही तो कहीं सूखा। इन सबका संबंध कहीं न कहीं हमारे उन कार्यों से है, जिसके चलते हम अपना पूरा परिवेश विषाक्त बना रहे हैं। आवश्यकता  है कि हम सब अब संकल्प लें कि ऐसे हर उस कार्य का परित्याग करने का, जिससे पर्यावरण प्रभावित होता है और जहां कहीं गड़बड़ी है। उसे दुरुस्त करने के लिए व्यक्तिगत और  सामूहिक प्रयास युद्ध स्तर पर करने का।

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