भाषा सबकी है

भाषा किसी जाती या धर्म की बपौती नहीं है। किसी भी व्यक्ति को कोई भी भाषा सीखने, पढ़ने और बोलने का अधिकार है। जैसे उर्दू में एक से एक नामचीन विद्वान हिंदू समाज से रहे हैं, वैसे  ही संस्कृत पढ़ने वालों में भी मुस्लिम विद्वानों की संख्या कम नहीं है। आज अंग्रेजी  बोलनेवाले इंग्लैंड से ज्यादा हमारे देश में है। हिंदी, अवधी तथा ब्रज भाषाओं को भी नामचीन मुस्लिम कवियों  और लेखकों ने अपने कार्यों से समृद्ध किया है। उत्कृष्ट साहित्य का सृजन किया है। अक्सर उर्दू और संस्कृत के विद्वान यह व्यथा व्यक्त करते पाए जाते हैं कि उर्दू को सिर्फ मुस्लिम समुदाय की  भाषा बताकर और संस्कृत को सिर्फ पूजा पाठ की भाषा बताकर उसके प्रचार-प्रसार में काफी व्यवधान किया गया। उससे इन भाषाओं के विकास में काफी नुकसान हुआ। भाषा सबकी है। इसे कुछ  खास लोगों के लिए बताना या उसके पठन-पाठन के लिए कोई खास वर्ग ही पात्र है यह कहना जहां एक ओर उस भाषा का दायरा सीमित करता है, वहीं दूसरी ओर समाज में एक अवांछनीय  भेदभाव का कारक बनकर एक निरर्थक विवाद भी खड़ा करता है, जिसका फायदा उठा कर विघ्नसंतोषी लोग समाज में कटुता निर्माण करते हैं। जो किसी भी तरह से न समाज के लिए ठीक है  ना देश के लिए ठीक है और न ही उस भाषा के लिए ठीक है।
रही बात संस्कृत की, तो इस भाषा में सहित्य के विविध  विधानों में तब उत्कृष्ट कार्य हुआ है, जब आज बोली या पढ़ी जाने वाली कई भाषाओं का जन्म नहीं हुआ था। हमारे वेदों को ज्ञान का  भंडार कहा जाता है। इस भाषा को आज संगणक के लिए सबसे सही माना जाता है। हर तरह के ज्ञान का बीज इसके ग्रंथों में होने की बात के बावजूद इसका प्रसार और विस्तार आम बोलचाल    भाषा के रूप में न होना कई विद्वान देश एक लिए नुकसानदायक मानते हैं। पूरी दुनिया में जिस भाषा के कार्यों का डंका बजता हो, वह क्यों नहीं देशव्यापी बनी, इसके लिए इसी तरह की सोच  जिम्मेदार है, जिसका दर्शन हमने हाल ही में बनारस में किया, जब एक दूसरे धर्मावलंबी को इस विषय को पढ़ाने पर आपत्ति की गई। परंतु भला हो विश्वविद्यालय प्रशासन का और राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ जैसी संगठनों का तथा अन्य गणमान्य जनों का जिन्होंने ऐसी सोच को खारिज होने के लिए बाध्य किया और इस बात को रेखांकित किया कि किसी को कोई भी भाषा पढ़ने पढ़ाने 
का अधिकार है। आज भी हिंदू समाज में फारसी और उर्दू के बड़े-बड़े विद्वान हैं। उसी तरह मुस्लिम समाज में भी संस्कृत के विद्वान हैं। भाषा लोगों को जोड़ने का माध्यम है। ज्ञान की कुंजी है।  यह भले ही किसी क्षेत्र विशेष में विकसित हुई हो। परंतु वह और उसमें हुए कार्य सम, समग्र मानवता की विरासत है। हमारे ग्रंथ दुनिया में बड़े आदर के साथ पढ़े जाते हैं। ऐसी मानसिकता यदि  अंग्रेज दिखाते, तो आज अंग्रेजी दुनिया को जोड़ने का सेतु नहीं बनती। विश्वविद्यालय प्रशासन और पूरे देश ने जिस तरह से ऐसे नापाक प्रवृत्ति को खारिज किया, वह अच्छी बात है। हमारे बीच  किसी भी तरह की संकीर्ण सोच को बढ़ावा नहीं  मिलना चाहिए, कारण ऐसी ही नकारात्मक सोच बड़ी समस्या का करना बनती है।
भाषा और साहित्य मानवीय प्रगति का झरोखा है, जो इस धरती पर मानव विकास की गाथा से परिचित कराता है। यही मानवता की साझी विरासत है। किसी भाषा की जानकारी उस समुदाय की  दिकाल से लेकर आज तककी जीवन कहानी से हमें परिचित कराती है। हमें और सक्षम बनाती है। लोगों को जोड़ती है। ऐसी जो भी प्रवृत्ति, जो इसके विपरीत करे, मानव-मानव में विभेद करे,  सका तिरस्कार, उसका नकारा जाना अनिवार्य है। ऐसी प्रवृत्तीयों का हर हाल में विरोध होना चाहिए। ऐसी बातें नकारी जानी चाहिए और वही हुआ। यह सराहनीय है।   

Post a Comment

[blogger]

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget