चीन-पाक का नापाक खेल

चिन और पाक हमारे चिर पड़ोसी हैं। हम चाह कर भी इस हकीकत को नहीं बदल सकते। ऐसे में दोनों की कुटिलता से पार पाना मुश्किल है। कारण दोनों ही मुंह में राम बगल में  छुरी की नीति के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं। दोनों जब मीठा-मीठा बोलते हैं तो उसका मतलब यही निकाला जाता है कि फिर इनकी ओर से कुछ गड़बड़ होने वाली है और हमें सतर्क हो जाना चाहिए। चीन को ही ले लें अभी चंद दिन पहले उनकी सेना ने सीमा पर शांति के लिए हमारी और अपने सत्ता प्रमुखों की सराहना की थी और अब पता लग रहा है कि वह  लद्दाख में विवादित क्षेत्र में भूमिगत मार्ग बनाने की कोशिश कर रहा है। यह अलग बात है कि हम इनकी हकीकत जानते हैं और इनका असली चेहरा पहचानते हैं और इसलिए सतर्क  रहते हैं और हमें इनकी उपस्थिति और कारस्तानी का पता चल गया है। 
वैसे भीचीन घुसपैठ बहादुर है। जब हमारे लोग टोकते हैं, तो अपनी हद में चला जाता है। परंतु इस बार वहां  तंबू गाड़ रहा है और उसकी मंसा भूमिगत मार्ग बनाने का है ऐसा सुर्खियों में आ रहा है, तो हमारे जवानों ने भी वहां गस्ती बढ़ा दी है। अब इस पर भी चीनियों के पेट में मरोड़ें उठ  रही हैं, तो तनाव बढ़ना लाजिमी है। उनकी ऐसी कारस्तानी उस समय और चौंकाऊ हो जाती है, जब हम पाकिस्तान से सीमा पर दो-दो हाथ करने को अंतत: बाध्य हो रहे हैं। कारण  वह घुसपैठ कराना चाहता है और हम होने नहीं दे रहे हैं। रही बात पाक की तो वहां Žबटवारे से ही बंद पड़ी सिखों की, हिंदुओं की, इबादतगाहों को पुन: दर्शन के लिए खोलने की  हलचल शुरू कर चुका है। इसमे कई खुल चुके हैं और कई पर तैयारियां हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर उसके द्वारा सीमा पर सीज फायर का उल्लंघन सतत जारी है, तो एक ओर प्यार  और दूसरी और हमला यह नीति समझ से परे है। सांत्वना की बात है तो सिर्फ यह कि हम और हमारी सेना और हमारे नीति नियंता इन दोनों राष्ट्रों के दुहरे मापदंड और दोनों चेहरों  से बखूबी वाकिफ हैं। पाक रोज अपनी दुस्साहस का खामियाजा भुगत रहा है। एक जमाना था, जब उसके परोक्ष युद्ध ने हमारे नाक में दम कर दिया था, परंतु आज उसे दिन में भी  हमारे हमले का सपना आ रहा है। कारण उसे हमारी सख्त कार्रवाइयों केबाद यह पता चल चुका है कि अब उसकी कोई नापाक चाल  हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। उसे अब पीओके उसके  हाथ से जाने का डर सता रहा है। कारण उसे मालूम है कि उस पर उसका नाजायज कब्जा है, जो उसे उसके जायज हकदार यानि हमें आज नहीं तो कल देना पड़ेगा। कमोबेश वही  डर चीन को भी है। कारण वह भी हमारे एक बड़े क्षेत्र पर नाजायज काबिज है।
डोकलाम में उसे पता चल चुका है कि आज के भारत से  निपटना टेढ़ी खीर है। उसे डोकलाम में पीछे हटना पड़ा तो अब वह भी प्यार की बात कर दगा देने का प्रयास करता रहता  है। परंतु उसकी पाक परस्ती और उसका कारण दोंनो हमें पता है, तो हमारी जितनी तीखी दृष्टि पाक पर है, उससे ज्यादा चीन पर, क्योंकि पाक तो पहचाना शत्रु है। चीन भाई-भाई कह  कर छुरा भोंकता है, जो वह 62 में कर चुका है और यह कड़वा सच है कि धोखे से वार एक बार हो सकता है बार बार नहीं। सारी बात का लब्बोलुआब यह है कि ये दोनों पड़ोसी भरोसे  के लायक नहीं हैं। कारण इनकी आत्मा साफ नहीं है। एक की भूपिपासा कभी खत्म नहीं होने की है और दूसरे का जन्म ही हमसे द्वेष के चलते है। जब तक इन दोनों को कायदे से  झटके नहीं लगेंगे ये राह पर नहीं आएंगे और हमारी पूरी तैयारी है। इस बार कोई भी दुस्साहस दोनों को भारी पड़ने वाला है इसका एहसास उन्हें भी है। इसलिए वह दोहरा खले खेल रहे  हैं, जो कभी कामयाब नहीं होगा।

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