बहुत कुछ किए जाने की जरूरत

हैदराबाद में हैवानियत का जो नंंगा नाच पूरे देश के सामने आया है, उसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। जिस तरह की पाशविकता का प्रदर्शन इन व्यक्तियों ने किया है, उससे तो पशुता भी पीछे छूट जाती है। ये उससे भी गए गुजरें हैं। उनका पातक इतना बड़ा है कि उनके परिजन भी उन्हें जीवित नहीं देखना चाहते। वकीलों ने भी इनकी पैरवी न करने का  संकल्प व्यक्त कर दर्शा दिया है कि इस घटना ने लोगों को कितने अंदर तक हिलाया है। लोगों का गुस्सा फूट-फूट कर बाहर आ रहा है। पूरी प्रशासनिक मशीनरी हरकत में है।  पुलिस महकमा भी सक्रिय है। आरोपी गिरफ्त में आ चुके हैं। उन पुलिस वालों को निलंबित भी किया गया है, जो टाल-मटोल को लेकर आरोपित हैं। यह सब ठीक है यह तो एक   मामले की बात है, जो एक उभरते महानगर में हुआ और जिस पर पूरे देश में मीडिया की नजर है। परंतु उन मामलों का क्या? जो रोज देश में घटित हो रही है और उनकी तादाद  सरकारी सख्ती और कड़ी कार्रवाई के बाद भी बंद नहीं हो रही है। अचानक पूरे देश में बलात्कार की घटनाओं में बाढ़ सी आई नजर आती है। शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता है, जब  देश के किसी कोने से कभी तो एक, कभी कई-कई घटनाओं की बात सामने न आती हो। पहले जिस तरह दहेज को लेकर एक भय का माहौल था अब उसका स्थान बलात्कार की  घटनाएं लेती प्रतीत हो रही हैं। इस सिलसिले को रोकना होगा और इसके लिए सरकार और प्रशासन को और चौकस तथा मुस्तैद होना होगा। परंतु उसके साथ जन-जन को भी सतर्क  और कार्यरत होना होगा। कारण यह समस्या या विकृति अब एक ऐसा खतरनाक स्वरूप अख्तियार कर रहा है, जो धीरे- धीरे इतना भयावह बन रही है कि हर अभिभावक को अपनी  बहन-बेटी बाहर भेजने के पहले दस बार सोचना होगा। दिल्ली में प्रदर्शन कर रही अकेली लड़की इसी बात पर जोर दे रही थी यह कानून व्यवस्था का मसला है, तो प्रशासन के विविध अंग उसकी फिक्र कर रहे हैं, परंतु इसके साथ-साथ यह सामाजिक समस्या भी है। कहीं न कहीं समाज और परिवार 'यत्र नार्यस्तु पूजयते रमंते तत्र' देवता का सिद्धांत सही  ढंग से आज के नौनिहालों को आत्मसात करवाने में विफल हो रहे हैं। इस ओर भी परिवार और समाज शास्त्रियों को ध्यान  देना होगा। कारण अपराध आदिम युग से होते हैं, परंतु  उनमें जैसी बढ़ोत्तरी हो रही है और उनमें जो विद्रूपता आ रही है। जिस निडरता से सामजिक और कानूनी दंडों की अनदेखी कर लोग ऐसे कुकर्मों को अंजाम दे रहे हैं, यह चिंता की  बात है। लगता है कि न उन्हें कानून का डर है, न समाज का। लोगों में गलत कामों को लेकर लोकलाज का डर खत्म होना हमारी सबसे बड़ी समस्या है। हमें अपने समाज का  नैतिक कलेवर कैसे मजबूत हों, इस बारे में भी सोचना होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि तकरीबन हर मामले में आरोपी को सजा मिल रही है, भले देर हो रही है, कड़े कानून प्रावधान  भी हैं, परिवार भी ऐसे कुकर्मियों की फजीहत करता है। बावजूद इसके इन पर लगाम न लगना और इसकी विद्रूपता और क्रूरता बढ़ते जाना दर्शाता है कि इससे निपटने की कानूनी  व्यवस्था को और सख्त तथा चुस्त-दुरुस्त करने के साथ-साथ समाज को भी और चौकस होना होगा तथा उन कारणों को भी मिटाना होगा। जिससे ऐसे कुसंस्कार बच्चों में पनपे ही  न। कारणे ऐसी घटनाएं जो एक जीवन तबाह करती है। एक परिवार तभा करती है देश के लिए भी कलंक की तरह है। इसकी बार-बार हो रही आवृति न हो, इसके लिए हम सबको  सजग होना होगा और उस तरह काम करना होगा।

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