इन्हीं कारणों से बेड़ा गर्क है

कांग्रेस की दिल्ली में रैली चल रही थी, लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी शिकस्त के बाद रणछोड़ दास बने राहुल गांधी भाषण दे रहे थे। अचानक उन्हें पता नहीं कहां से वीर  सावरकर याद आ गए और जुमा-जुमा किसी तरह बनी महाराष्ट्र सरकार हिचकोले खाने लगी। जैसा स्वाभाविक था राज्य के हर दलों द्वारा उसका कड़ा प्रतिकार किया गया और
जिसकी गूंज राज्य के राजनीतिक माहौल में अभी भी है। ऐसा कमाल राहुल गांधी ही कर सकते हैं बावजूद इसके तथा कथित निष्ठावान कांग्रेसी उन्हें पुन: पार्टी की कमान दिलाने के  लिए आतुर हैं। यह अलग बात है कि अपने नेतृत्व में जिस पार्टी को उन्होंने लगभग सुला दिया था, सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद वह पुन: रेंगने लगी हैं। शायद उन्हें यह रास नहीं आ रहा है।
मुद्दे देश और काल की आधार पर बदलते रहते हैं। कुछ बातें स्थायी होती है और कुछ समय के मांग के अनुसार आकर लेती रहती है। जबकि  कांग्रेसजन आज भी यही मान कर चल रहे हैं कि जो वह सोचते हैं, करते हैं उसी के अनुसार देश चलता है और वैसी ही घुट्टी वे राहुल गांधी को भी पिला रहे हैं, तो देश क्या चाहता  है? देश क्या सोच रहा है इस पर ध्यान न देकर वह वही कर रही हैं, जो उनके पुरातन पंथी सलाहकार सिखा-पढ़ा रहे हैं। परिणाम पार्टी लगातार पीछे जा रही है और कार्यकर्ता भ्रम  का शिकार हो रहे हैं। आज पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की वाहवाही इसलिए कर रही है, क्योंकि उसने देश में उन मुद्दों का सफलता पूर्वक समाधान किया  है, जिनका समाधान हो सकता  है यह कांग्रेस ने अपने सत्तर वर्षों के शासन काल में कभी आभास तक नहीं होने दिया।
अलबत्ता कई नेता यह कहते रहे कि यदि ऐसा होगा तो  पहाड़ टूट जाएगा। अब जबकि उक्त सभी मुद्दों पर कुछ पर सरकार ने कुछ पर न्यायालय ने फैसले ले लिया है और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर भी काम होने  की  सुगबुगाहट है। कांग्रेस कार्यकर्ता कैसे उसका विरोध करें, वह यह ही नहीं समझ पा रहे हैं, जबकि नेता उसी पर पिले पड़े हैं। भाजपा को छोड़िए देश की जनता इनका मजा ले रही है। हर मोड़ पर आधारहीन विरोध ही विरोध नहीं होता। माकपा और भाकपा को देखकर कांग्रेस को यह समझ आ जाना चाहिए। कारण वह भी तेजी से उनके समकक्ष बनाने की राह पर  हैं। कारण उसका एजेंडा देश ने सत्तर साल देखा है। अब पिछले साढ़े पांच साल से दूसरे एजेंडा देख रही है और उसमें हो रहे निर्णयों से प्रभावित है। इस दौरान कांग्रेस को जो थोड़ी- बहुत सफलता कुछ राज्यों में मिली वह नेतृत्व का कौशल नहीं, बल्कि स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व की एकजुटता और मेहनत का और लोकलुभावन नारों की सफलता रही है।
कांग्रेस के  लिए जो मुद्दे अछूते थे आज उनका समाधान हकीकत में बदल चुका है। इससे कांग्रेस परिचित है और आज कांग्रेस को शिवसेना के साथ जाकर सरकार बनाने से भी परहेज नहीं है,  तो फिर उल्टी- सीधी Žबयानबाजी से अपनी मिट्टी खुद ही क्यों पलीद कर रहे हैं। अब कांग्रेस को हर तरह से अपने आपको पुन: अविष्कृत करना होगा और वह सिर्फ विरोध के लिए,  विरोध करने से नहीं होगा। एक सुर कितना भी अच्छा क्यों न हो उसे बार-बार लगातार नहीं सुना जा सकता। कारण एकरास्ता बोरियत का कारण बनती है। कांग्रेस कुछ ऐसा नया  नहीं कर पा रही है, जिससे उसके प्रति लोगों का आकर्षण बढ़़े अभी तक वह अपनी मेहनत कम सत्तापक्ष की कमजोरियों का फायदा उठाती रही है, परंतु इस बार उनका सामना  मोदी और शाह की ऐसी जोड़ी से है, जो अपने हर कदम से और ज्यादा जनमत और वाहवाही हासिल कर रही है। तो कांग्रेस को उसे भी अपने तौर- तरीके बदलने होंगे, नहीं तो जैसे  Žबयान कांग्रेस के वारिस देते रहे हैं, उसका और बेड़ा गर्क होना तय है।

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