अमित शाह ने तीन उत्तर पूर्वी नेताओं से की बातचीत

नई दिल्ली
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन विधेयक पर शनिवार को असम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय के राजनीतिक दलों, छात्र एवं नागरिक संगठनों के साथ बातचीत  की। कांग्रेस पार्टी की असम और त्रिपुरा इकाई जबकि त्रिपुरा की सीपीआई (एम) इकाई ने इस मीटिंग का बहिष्कार किया। शाह 3 दिसंबर को ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू)  के नेताओं के साथ मीटिंग करेंगे।

इन संगठनों से हो रही है चर्चा
इसके अलावा, जिन संगठनों के साथ उनकी चर्चा का कार्यक्रम है उनमें नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन, ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन एवं मेघालय, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश के  छात्र संगठन शामिल हैं। उन्होंने बताया कि कई राजनीतिक दलों के नेता राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय और राज्य प्रमुख, दोनों सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के प्रमुखों को भी  चर्चा के लिए आमंत्रित किया गया है। नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ पूर्वोत्तर में कई संगठनों की ओर से किए गए जोरदार प्रदर्शनों के मद्देनजर शाह यह बैठकें कर रहे हैं।

तीन मुख्यमंत्रियों से रिजिजू की बात
असम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय के मुख्यमंत्रियों क्रमश: सर्बानंद सोनोवाल, पेमा खांडू और कोनार्ड संगमा ने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू एवं कुछ सांसदों के साथ शनिवार की चर्चा   में भाग लिया। खांडू ने रिजिजू को अरुणाचल प्रदेश के स्थानीय आदिवासी समुदायों की चिताओं से अवगत करवाया। उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल,  2016 के बिल्कुल खिलाफ है, जो अब सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल, 2019 के नाम से जाना जा रहा है।

स्थानीय आदिवासियों के हितों की चिंता
अरुणाचल के सीएम ने कहा कि उनके राज्य में स्थानीय आदिवासी समुदायों की हितों की रक्षा सुनिश्चित करनी होगी। उन्होंने विधेयक में ठोस सुरक्षात्मक उपायों के प्रावधान करने  पर जोर दिया। अरुणाचल सरकार ने एक कम्युनिक में कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सभी पक्षों को इनर लाइन परमिट (आईएलपी) में बदलाव नहीं करने का आश्वासन दिलाया।

कई संगठनों का विरोध

पूर्वोत्तर के लोगों के एक बड़े तबके और संगठनों ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि यह 1985 में हुए असम समझौते के प्रावधानों को प्रभावहीन कर देगा।  यह समझौता 24 मार्च, 1971 के बाद के सभी अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने की बात कहता है, भले ही उनका धर्म कुछ भी हो। वहीं, नागरिकता अधिनियम 1955 में  प्रस्तावित संशोधन पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के हिंदू, सिखों, बौद्ध, जैन, पारसियों और ईसाइयों को भारत की नागरिकता देने की बात कहता है, भले ही उनके पास कोई उचित दस्तावेज नहीं हों।

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