यह होना ही था

दिल्ली की एक अदालत ने मुजफ्फरपुर कांड में लोगों को दोषी करार दिया है। जिस तरह की हैवानियत का प्रदर्शन उक्त शहर के शेल्टरहोम में हुआ था और जिस तरह की लोमहर्षक  घटनाएं सामने आई थी वह किसी भी संवेदनशील समाज और व्यक्ति को सुन्न करने के लिए काफी थी। इसको लेकर बिहार सरकार की भी काफी किरकिरी हुई थी। समाजकल्याण  विभाग से जुड़े मंत्री को अपना पद भी गंवाना पड़ा था और यह सब करने वाले सफेदपोश लोग जिन पर असहाय महिलाओं और बच्चियों के रक्षण की जिम्मेदारी थी वही भक्षक बन  गए थे। इनका दोषी पाया जाना उन बच्चियों और महिलाओं के लिए राहत होगी, जिन्होंने न जाने कितनी झल्लाहट और दरिंदगी का सामना किया। अब इन्हें सजा सुनाए जाने के  बाद जो 28 जनवरी को सुनाई जाने वाली है, यह नि:संदेह सबक होगा समाज में ऐसे कार्यों में लगे लोगों के लिए कि वे अपनी जिम्मेदारियों का इस तरह निष्पादन करें कि उनके  आश्रमों में रहने वालों का जीवन नरक न हो और जिस पवित्र अवधारणा से ऐसे आश्रमों की संकल्पना की गई है वह पूरी तरह लागू हो। हमारे यहां लोगों की व्यवस्था को विद्रूप करने  की बड़ी बुरी आदत है। रसूखदार लोग अपनी पहुंच का नाजायज फायदा उठाते हैं और उनके आतंक के डर से लोग सब कुछ जानकर भी चुप रहते हैं। इसलिए ऐसे जघन्य काम वर्षों  तक चलते रहते हैं। भला हो उस एजेंसी का, जिससे इसका ऑडिट किया और वहां चल रहे घृणित और अमानवीय कारोबार को उजागर कर मासूमों के साथ हो रहे शोषण से उन्हें  निजात दिलाई। ऐसे क्रूर काले कर्म करने वाले लोगों को उनके अंजाम तक पहुंचने में मदद न की।
इसघटना के बाद देश में जो माहौल बना, उससे ऐसे आश्रमों की जांच-पड़ताल की गई है और उस दौरान ही कई और ऐेसे आश्रम के संचालकों पर भी कार्रवाई हुई है। न्यायालय ने  सबूतों के आधार पर इन सबको दोषी पाया है और अगले हफ्ते सजा सुनाई जाएगी। व्यक्ति को अच्छे-बुरे कर्मों का फल देर से ही सही अवश्य मिलता है। यह इस धरती की रीति है  इसके बाद भी लोग ऐसे- ऐसे घृणित और जघन्य काम कर जाते हैं, जिससे वे तो शर्मसार होते हैं और देश तथा राज्य की छवि भी खराब करते हैं। वे अपने बाहुबल और धनबल के  मद में भूल जाते हैं कि उन्हें कभी अपने कुकर्मों की सजा मिलेगी। गलत- गलत है और उसका परिणाम भोगना ही पड़ता है। ये दोषी सिद्ध हो गए हैं। इसी से हमारा काम खत्म नहीं  हो जाता। कारण इन आश्रमों के संचालकों के अलावा इनकी देखरेख, निरीक्षण-परीक्षण की पूरी व्यवस्था है। विभाग है, अधिकारी है बावजूद इसकेऐसी गतिवधियां लंबे समय तक  प्रकाश में नहीं आई और यह सिर्फ बिहार तक ही सीमित नहीं रहा। इसके बाद कई राज्यों में ऐसी घटनाएं सामने आई है और उन पर कार्रवाई भी हुई है। कम से कम अब हर स्तर  पर समय-समय पर विभागीय निरीक्षण होते रहे हैं और इसमें अलग स्वतंत्र इकाइयों को भी लगाया जाए, जिससे ऐसे लोहर्षर्क घटनाओं की पुनरावृत्ति फिर न हो। न्यायालय अपना  काम कर रहा है, पुलिस ने तथा एजेंसियों ने भी जांच में अपनी भूमिका अदा की तभी अपराधी दोषी सिद्ध हुए। परंतु समाज को भी अपने आसपास के परिवेश के बारे में चौंकन्ना  रहने की जरूरत है और यदि वे अपने आस-पास कुछ उलटा-सीधा पाएं, तो उस पर संबंधित विभाग का ध्यानाकर्षण करना चाहिए, जिससे ऐसी चीजें बड़ी वारदात बनने से पहले ही  रोकी जा सकें।

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