एक अच्छी पहल

मुंबई मनपा देश की मनपाओं की सिरमौर है। यह मनपा सिर्फ धन के मामले में ही आगे नहीं है, इसका बजट देश के कई राज्यों के बजट से ज्यादा है। काम में भी वह उतनी ही  धनी है। इसने कई ऐसे काम किए हैं, जिसकी सराहना केंद्रीय एजेंसियों ने भी की है, तो इसकी कमियों पर भी तीखे प्रहार हुए हैं। शायद यह देश की पहली मनपा है, जो हिंदी भाषी  और अंग्रेजी के अलावा और कई राज्यों की भाषाओं के स्कूल चलाती है और मुंबई की बहुरंगी जनसंख्या के मद्देनजर उचित और सराहनीय है। यही सब मुंबई और उसकी मनपा को  अनूठा बनाता है। जिस तरह यहां मिनी इंडिया निवास करती है वैसे ही यहां की हर व्यवस्था सबको अपनी लगे, इसका भी पूरा ध्यान रखा गया है। इधर नए- नए बोर्ड और निजी  स्कूलों की भरमार ने परंपरागत सरकारी स्कूलों और स्थानीय निकाय द्वारा संचालित स्कूलों की मांगी काफी कम कर दी थी। इसमें अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्रमुख कारण रही है।  हिंदी भाषी और अन्य भाषी माध्यमों के मनपा स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार घटती नजर आई और कई स्कूलों में ताले लग गए या छात्रों की संख्या अपेक्षानुरूप नहीं रही। यह  स्थिति मुंबई या प्रदेश तक ही सीमति नहीं है यह एक देशव्यापी समस्या बन गई है। इस पर देश स्तर पर विचार- विमर्श हो रहा है। मुंबई जैसे स्थानीय निकाय भी अपनी ओर से  समय-समय पर तब्दीली करते रहे हैं। इन सरकारी स्कूलों के साधन-सुविधाएं योग्य अध्यापकों में कोई कमी नहीं है। लगभग हर आवश्यक सामग्री और खानपान तक मुफ्त उपलब्ध  है। फिर भी आकर्षण कम क्यों? इस पर विचार होना चाहिए था और हुआ। कहीं-कहीं इसके लिए पठन-पाठन में लापरवाही भी जिम्मेदार रही। इस पर भी कार्रवाई हुई, अंग्रेजी को भी  यथोचित तवज्जो दी जा रही है और अब से सीबीएसई और आईसीएससी बोर्ड की भी पढ़ाई शुरू करने की ओर मनपा ने कदम उठा दिया है। यह सर्वथा अभिनंदनीय है। परंपरागत  शिक्षा के कुछ बिंदु सनातन हंै। परंतु कई बातों में वक्त के साथ तब्दीलियां आती रहती हैं। नए-नए वैज्ञानिक और तकनीकी प्रयोग से भी छात्रों को अवगत होना जरूरी है। पठन- पाठन के तौर-तरीकों में भी काफी बदलाव आया है। देश और काल में मांग के अनुसार शिक्षण संस्थानों और शिक्षा प्रणाली का अद्यतन होना भी जरूरी है और इस लिहाज से निजी  स्कूल काफी आगे हैं। परंतु उनका शिक्षा का स्तर विश्वसनीय नहीं है, इसलिए कोचिंग स्कूलों और निजी ट्यूशनों की उतनी ही भरमार है। इसलिए सरकारी और स्थानीय निकाय जो  लगभग मुफ्त पढ़ा रहे हैं उन्हें अपने हर चीज को इतना निष्णात करना होगा कि वे निजी स्कूलों से प्रतियोगिता में पीछे न जाएं और कोचिंगसंस्थानों में जो बाढ़ आ गई है और  जिसके चलते अभिभावकों को एक ओर स्कूल को लीगल फीस और दूसरी ओर कोचिंग की फीस की जो दोहरी मार झेलनी पड़ती है उससे उसकी बचत हो सके। विभिन्न बदलाओं के  साथ इस पर भी इस विभाग के जिम्मेदार लोगों को सोचना होगा। कारण यह आम-अवाम की कमर तोड़ रहा है। इसका मतलब साफ है कि शिक्षा का स्तर उतना विश्वसनीय नहीं है  जैसा होना चाहिए। कुछ लोगों को कोचिंग की जरूरत पड़े समझ आता है, परंतु बहुमत को इसकी जरूरत पड़े, तो जरूर दाल में कुछ काला है। मुंबई मनपा जो भी कर रही है वह  स्तर सुधारने के साथ-साथ सारी सुविधाओं को अद्यतन कर रही है। साथ ही छात्रों को कई बोर्डों के माध्यमों का विकल्प दे रही है। यह अच्छी पहल है इसका स्वागत करते हुए यह  अपेक्षा भी है कि वहां का माहौल किसी भी निजी संस्थान से अच्छा हो इस बारे में प्रयास जारी रहना चाहिए।

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