एक विचारणीय पहल

देश के 208 विद्वानों द्वारा प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर यह बताना कि शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक माहौल खराब करने का काम वामपंथी विचारधारा वाले लोग कर रहे हैं और इस  माध्यम से अतिवादी वामपंथी एजेंडे को लागू करने की कोशिश की जा रही है यह काफी चिंताजनक और विचारणीय है। यह बड़े खेद की बात है कि छात्र राजनीति और छात्र संगठन  को लेकर जो शुरुआती अवधारणा थी वह न होकर छात्र आंदोलन या छात्र राजनीति उन सभी बुराइयों से ग्रस्त है, जो आम राजनीति का हिस्सा है। मसलन चुनावों में जाति का, क्षेत्र  का, धन बल, बाहु बल का खेल खूब खेला जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण राजनीति में युवा मतों की महत्ता बढ़ जाना और इन्हें अपने पाले में करना राजनैतिक दलों के लिए  अनिवार्य बन जाना है। जबसे मतदान की उम्र 18 वर्ष हुई है, तबसे इस वर्ग को आकर्षित करने की राजनीतिक दलों में होड़ मच गई है। हर राष्ट्र या दल की छात्र इकाई है और  जिन राज्यों में जिस क्षेत्रीय दल का बोलबाला है, उसकी उस राज्य में सशक्त छात्र इकाई है। इन सबके आकर्षण कॉलेज जाने वाले युवा छात्र है, जो उन्हें अपनी-अपनी विचारधारा का  बनाने के लिए, उनका मत प्राप्त करने के लिए, उन्हें अपनी ओर करने के लिए वे सारे हथकंडे अपनाते हैं, जो आम राजनीति में अपनाए जाने के लिए हम कुख्यात हैं। तो जहां  छात्र राजनीति का मतलब छात्रों में नेतृत्व गुण विकसित करना था, अब वह तू बड़ा कि मैं बड़ा की ऐसी गलाकाट प्रतिस्पर्धा का कारक बन गया है, जो पूरे व्यवस्था को ही पंगु बना  रहा है। कारण अपनी पार्टी की छात्र इकाई का परचम हर संस्थानों में लहरे यही उनका ध्येय वाक्य बन गया है और बाकी सब चीजें गौड़ हो गई है। इसमें हर पार्टी अपनी ताकत  और अपने कुशल लोगों को लगाती है। इस क्षेत्र में सबसे पहले सक्रिय वाम संगठन हुए। कारण उन्हें यह सबसे पहले समझ आया कि इससे अनुयायियोंकी अच्छी संख्या खड़ी की   जा सकती है, तो उनका आधार हर जगह है और जब दूसरों ने भी सक्रियता बढ़ाई तो टकराव होना ही है। कारण कच्ची उमर में वाम पंथ के नारे बड़े लुभावने लगते हैं, परंतु जैसे- जैसे व्यक्ति बड़ा होता है उसका बौद्धिक विकास होता है। दुनियादारी की बात उसे समझ में आती है, तब उसे पता चलता है कि जीवन इतना विचित्र है कि वह किसी भी विचारधारा  के तहत कैद होकर नहीं रहा सकता। वाम पंथ आज पूरी दुनिया में तकरीबन खत्म हो चुका है। चीन में है, परंतु कितना वामपंथ है, कहा नहीं जा सकता। हमारे देश में भी इसका  लगातार क्षरण हो रहा है, परंतु बौद्धिक स्तर पर छात्रों में देश की शिक्षण संस्थानों में आज भी इसकी पकड़ थोड़ी बहुत बची है। जब नए दावेदार आगे आ रहे हैं, तो इसकी पकड़ और  ढीली हो रही है। तो अपने को बचाने के लिए ये कड़ा प्रतिकार कर रहे हैं। परंतु ऐसे करते समय हिंसा का अवलंब, आजादी को अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश, देश के  सांस्कृतिक प्रतीकों को अपशब्द कहना आदि इन्हें देशव्यापी रोष का कारक बन रही है और उन संस्थाओं का जो अध्ययन अध्यापन और शोध के केंद्र हैं, इस तरह हिंसा और अनुचित  आंदोलनों में लिप्त कर रही है कि वहां अराजकता की स्थिति बना रही है। संक्षेप में छात्र शिक्षा का काम नहीं कर रहे हैं बाकी सब कुछ कर रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में उक्त शिक्षाविदों  की चिंता सामयिक, सही और विचारणीय है। पूरी स्थिति की व्यापक समीक्षा हो और तद्नुसार त्वरित उपचारात्मक कदम उठाए जाएं। कैंपस में राजनीति का अखाड़ी न बने, छात्र  संगठन गैर-राजनीतिक हों इस दिशा में भी कुछ सख्त कदम उठाना वक्त की मांग है। जरूरत हो तो इस बारे में कानून भी बनाएं।

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