वक्त बदल रहा है

कानून-व्यवस्था का मामला किसी भी सरकार के लिए सबसे संवेदनशील होता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड Žयूरो ने अभी नए आंकड़े जारी किए हैं, जिसके अनुसार उत्तर प्रदेश में  व्यक्तिगत अपराधों की संख्या कमोबेश पहले जैसी ही है, पर पिछले वर्ष एक भी दंगा नहीं हुआ है, जबकि अन्य राज्यों में यह आंकड़ा ठीक-ठाक है। उस प्रदेश में जहां दंगों का  इतिहास रहा हो, वहां यह रिपोर्ट थोड़ी आश्चर्यजनक है। यह जानना बहुत जरूरी है कि योगी आदित्यनाथ के आने के बाद सरकार के तौर पर उत्तर प्रदेश में क्या हो रहा है और  उसका असर क्या है। योगी सरकार के सत्ता में आते ही अपराधियों के एनकाउंटर का सिलसिला शुरू हुआ, तो राजनीतिक सवाल जरूर खड़े हुए, पर आम जनता में सराहने का भाव  आया। गिरोहबंद बदमाशों पर इसका असर भी दिखा। कई जगह से खबरें आईं कि दुर्दांत अपराधी पुलिस की गोली के डर से खुद अदालतों में जाकर समर्पण कर कर रहे हैं। निवेशक  सम्मेलन में आए उद्यमियों ने कानून-व्यवस्था के माहौल की तारीफ की और बड़े पैमाने पर निवेश की घोषणाएं कीं। योगी खुद सार्वजनिक मंचों से अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस  की मंशा जाहिर कर रहे थे। उसी का नतीजा था कि तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और राम मंदिर जैसे संवेदनशील मसले का फैसला आने पर भी शांति बनी रही। लोकसभा चुनाव में  पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कम बूथ होने के बावजूद काफी हिंसा हुई, पर उत्तर प्रदेश में बड़ी बूथ संख्या होते हुए भी कहीं से हिंसा की सूचना न आना यहां की कानून-व्यवस्था की  उपलब्धि रहा। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में उपद्रव हुआ, पर उपद्रवियों से सरकारी संपत्ति के नुकसान की वसूली का एलान होते ही स्थिति बदल गई। इससे सामाजिक  दबाव भी बना। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश पहले से थे, लेकिन राजनीतिक कारणों से किसी सरकार ने इस पर अमल करने की हिम्म नहीं दिखाई। नागरिकता  संशोधन कानून के विरोध में उत्तर प्रदेश में हुई हिंसा में 10,000 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति का नुकसान हुआ। अगर उत्तर प्रदेश सरकार नुकसान की भरपाई का कदम नहीं उठाती, तो यह घाटा प्रदेश सरकार को झेलना पड़ता। इसका अनुकरण करते हुए कर्नाटक सरकार और रेलवे ने भी तोड़फोड़ और संपत्ति के नुकसान करने वालों को वसूली के नोटिस   जारी किए। उत्तर प्रदेश के इतिहास में अपराध और दंगों के कई काले किस्से दर्ज हैं। पूर्ववर्ती सरकारों में कानूनव्यवस्था एक बड़ा मुद्दा बन गई थी, लेकिन अब वक्त बदलता दिख  रहा है। पुलिसकर्मियों और अधिकारियों का मनोबल बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठाए गए। इसके परिणामस्वरूप वे पुलिसकर्मी, जो थानों से, बैरकों से निकलते नहीं थे, आज  अपराधियों पर टूट पड़े हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनेक साहसिक मुठभेड़ें हुई हैं। कुछ आलोचकों ने आरोप लगाया कि ये मुठभेड़ें फर्जी हैं। जबकि मुठभेड़ विधिसम्मत तरीके से की  गईं। हाल में जितने भी घटनाक्रम हुए हैं, उनमें पुलिस द्वारा न्यूनतम बल प्रयोग किया गया है। इसके अतिरिक्त लखनऊ और नोएडा जैसे शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली शुरू की  जा रही है। कुछ राज्यों के बड़े शहरों में यह प्रणाली पहले से काम कर रही है। उत्तर प्रदेश के शहरों का जिस तरह से विस्तार हुआ है, उसमें इसकी जरूरत महसूस की जा रही थी।  पर इसके दूरगामी असर के बारे में आने वाले समय में ही पता चलेगा।

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