दंगों का असहनीय दर्द

दिल्ली की बस्तियों में हुए दंगों ने लोगों के मन में हमेशा के लिए टीस पैदा कर दी है। इससे भी ज्यादा दुख इस बात का है कि तीन दिन तक चले हिंसा के इस तांडव को  सांप्रदायिक रंग दे दिया गया, जबकि हिंसा फैलाने वालों के बारे में अब तक यही कहा जा रहा है कि यह शरारती तत्वों का काम था और किसी के इशारे पर इसे अंजाम दिया गया  है। इस बात के भी संकेत मिले हैं कि यह कुछ पेशेवर आपराधिक समूहों का काम था। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कोई पेशेवर आपराधिक समूह इतने बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाता है, तो इसके पीछे निश्चित रूप से कोई हाथ होगा, साजिश होगी। अब दंगों की जांच पुलिस के दो विशेष जांच दलों (एसआईटी) को सौंपी जा चुकी है, ऐसे में उम्मीद की जानी  चाहिए कि सच सामने आएगा।
दिल्ली के दंगा पीड़ित खासतौर से जिन लोगों ने अपनों को हमेशा के लिए खो दिया है, वे सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर हमने किसी का क्या बिगड़ा था, जिसकी वजह  से आज ये दिन देखना पड़ा है, लेकिन दंगों का इतिहास बताता है कि ऐसे सवालों का किसी के पास कोई जवाब नहीं होता और ये सवाल वक्त के साथ चले जाते हैं। दंगों में किसी  ने अपने जवान बेटों को खोया, तो किसी ने अपनी बूढ़ी मां को। दंगाइयों ने ये भी नहीं देखा कि 85 साल की बूढ़ी महिला को जिंदा जलाने से उन्हें क्या हासिल होने जा रहा है,  क्योंकि नफरत के उन्माद में उन्हें तो बस मारकाट मचा कर अपना मकसद पूरा करना था। जो लोग तेजाबी हमले में झुलस गए या तलवार और गोलियों के हमले में जख्मी हो गए,  वे शायद ही इन खौफनाक क्षणों को भूल पाएं। तीन दिन के दंगों में जिस तरह से दुकानें लूटी गईं, तोड़फोड़ कर उन्हें आग के हवाले कर दिया गया, उससे अब लोगों के सामने रोजी- रोटी का बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। कैसे लोग फिर से अपना काम-धंधा शुरू करेंगे, यह बड़ा सवाल है।
ज्यादातर दंगा पीड़ित रोज कमाने-खाने वाले हैं, मजदूरी करने वाले हैं, जिनके पास अब न रहने को ठिकाना बचा है, न अगले दिन के लिए काम। दंगों का दर्द कब तक रुलाएगा, कोई नहीं जानता। कई दिनों से लोग अपनों की तलाश में इधर से उधर भटक रहे हैं। अस्पतालों से लेकर थानों तक के चक्कर लगा रहे हैं, आसपास के नालों में खोजबीन करवा रहे  हैं। रह-रह कर लाशें मिलने का सिलसिला जारी है। हालत ये है कि अस्पतालों में शवों का पोस्टमार्टम तक नहीं हो पा रहा है। लोग इसी इंतजार में हैं कि उनके अपने का पोस्टमार्टम  हो जाए और अंतिम संस्कार तो ठीक से हो जाए। पर दंगों से जो सवाल फिर से निकले हैं, वे वहीं के वहीं हैं, जैसे दंगाई कौन थे, किसके इशारे पर दंगे हुए, शुरुआत में पुलिस मूकदर्शक-सी क्यों बनी रही? हमेशा की तरह इन सवालों के जवाब भी शायद ही मिलें। हालांकि दिल्ली में हुई हिंसा को लेकर जिस तरह कुछ विदेशी अखबारों और नेताओं ने भारत की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया, उस पर भारत सरकार ने उचित ही सख्त रवैया अपनाया है। सुरक्षा व्यवस्था किसी भी देश का निजी मामला होता है और दंगे-फसाद  जैसी घटनाओं से कैसे निपटना है, उस पर फैसले भी वहां की सरकार को ही करने होते हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तक दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा कर चुके हैं और शांति  बहाली के लिए आवश्यक दिशानिर्देश दे चुके हैं। जबकि अगर कुछ नेताओं को यह पर्याप्त नहीं लगता है तो यह उनकी संकुचित दृष्टि और मानसिकता ही कही जाएगी। किसी भी देश  में हुई हिंसक घटनाओं को अपने राजनीतिक लाभ के लिए तोड़-मरोड़ कर पेश करने या फिर नाहक उस देश की छवि खराब करने की कोशिश अंतर्राष्ट्रीय तकाजों के विरुद्ध कही  जाएगी।

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