जिम्मेदार शहरी बनने की जरूरत

संपत्तिकर नपा और मनपाओं की आय का एक मुख्य स्रोत है। विशेषकर जबसे चुंगी खत्म हुई है तबसे इस पर निर्भरता ज्यादा है। परंतु हमारे यहां कर जमा करने में ही सबसे  ज्यादा ढिलाई बरती जाती है, जबकि इनके बजट का काफी हिस्सा इन आमदनियों पर निर्भर रहता है। स्थानीय निकाय अपने दायित्वों को पूरा करने में जरा सा विफल हुए नहीं कि  पूरा मीडिया जगत, समाज उनके पीछे पड़ जाता है। यह सही है, यह उनका अधिकार है, परंतु उसी तरह समय पर अपना कर जमा करना भी हमारी जिम्मेदारी है, जिसका भान हर  नगर, महानगरवासियों को रखना चाहिए, तभी सेवाएं चाक चौŽबंद होंगी। कारण यह कोई व्यापारिक उपक्रम नहीं है और न ही इनका लक्ष्य लाभ कमाना है, इनका काम करों से, इनके  द्वारा संचालित सेवाओं की कमाई से और सरकारों के अनुदान से चलता है। यदि यह समय पर नहीं मिलेगा, तो ये अपना काम कैसे करेंगे? इसका ध्यान रखना भी हर नागरिक की  जिम्मेदारी है। जब दोनों ओर से अपनी दायित्वों का, जिम्मेदारियों का सही और समय पर अनुपालन होगा, तो काम में भी कोई बाधा नहीं आएगी और हर काम समय से पूरे होंगे।  जनता का काम सिर्फ पांच साल में एक बार मत देना नहीं है, बल्कि सरकार और स्थानीय निकाय के कार्यों पर नजर रखना भी है, साथ ही इन्हें लेकर उसकी जो जिम्मेदारी है, जो  कर्तव्य है, उसे भी पूरा करना है। मुंबई में लंबे समय से कुछ भवन निर्माता कर नहीं दे रही थे, परंतु जैसे ही जब्ती शुरू हुई तो उन्होंने आनन-फानन में पैसे जमा कारवा दिए इसका  मतलब साफ है कि वे ऐसा कर सकते थे, परंतु टालते रहे और जैसे ही उंगली टेढ़ी हुई, उन्होंने अपना बकाया संपत्ति कर चुकता कर दिया। मतलब साफ है कि लोग सख्त कार्रवाई  का इंताजर करते हैं और मजबूरी में तुरंत भुगतान कर देते हैं और बार-बार याद दिलाने पर भी उसे अनसुना करते हैं यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है। भुगतान में देरी से स्थानीय निकायों  के काम में देरी होती है और सख्ती से संबंधित व्यक्ति की छवि खराब होती है। हमें इस परिस्थिति से बचनी चाहिए और इसे भी जरूरी कर्तव्य मानकर और जरूरी कार्यों की तरह  समय से संपादित कर देना चाहिए। इससे किसी को भी कोई परेशानी नहीं होती। हां मनपा- नपाओं को भी अपना हिसाब-किताब और वसूली व्यवस्था को चाक-चौबंद रखना चाहिए।  लोगों का हिसाब सही होना चाहिए। समय पर उन्हें रसीद वगैरा मिलनी चाहिए और जमाकर्ता को त्वरित सेवा मिलनी चाहिए। जिससे वहां जाने पर वह हलाकान न हो और नहीं  उसका समय खराब हो। इससे इन संस्थाओं के काम में भी तेजी आएगी और हमें अच्छी सेवा मिल सकेगी। जब इनकी ओर से सही सेवा नहीं मिलेगी, तब हम इन्हें जवाबदेह  बनाएंगे, तो उसका असर ज्यादा होगा। हम बिजली, पानी, सडक का उपभोग करते हैं। इन सबके अलावा साफ-सफाई की, रोशनी की जिम्मेदारी इन निकायों की है या अन्य सरकारी  संस्थाओं की है, तो उनका पैसा भी हमें सयानुसार देना चाहिए तभी सेवाएं सही रहेंगी नहीं, तो हर चीज के लिए सख्ती बरती जाए, पुलिस लगाया जाए, जब्ती की जाए यह भी ठीक  नहीं है। बिन भय की भी प्र्रीति हो सकती है। यह करके हमें दिखाना होगा और हमें एक जिम्मेदार शहरी बनना होगा। जब तक क्षेत्र विशेष के नागरिक अपने हक और दयित्यों  दोनों को लेकर संजीदा नहीं होंगे, हक के लिए हो हल्ला मचाएंगे और कर्तव्य से मुंह चुराएंगे, तो एक आदर्श स्थिति का निर्माण नहीं हो सकता, उसके लिए दोनों को बराबर का महत्व देना जरूरी है।

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