स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना ही उपाय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले ही कार्यकाल से 'मेक इन इंडिया' पर जोर दिया है. अपने हर संबोधन में प्रधानमन्त्री स्थानीय उत्पादों के उपयोग को वरीयता देने की बात कर रहे हैं. कोरोना काल में यह साबित हो रहा है कि हमारे उत्पादों ने हम लोगों की जरूरतें पूरी की. चीन जैसा हमारा चिर अशुभचिंतक हमें साढ़े पांच लाख करोड़ का माल बेचता है और हमसे एक लाख करोड़ का माल लेता है. यह हमारे उद्यमियों के लिए लज्जा की बात है कि वह हमें दीपक, पिचकारी, रंग, झालरें ,फर्नीचर और खिलौने तक बेचता है. हमी से कमा कर हमें ही आँख दिखाने की भी जुर्रत करता है. हमें यदि इस हास्यास्पद स्थित से बचना है तो हमें कम से कम ऐसी चीजों के निर्माण में आत्मनिर्भर बनना होगा, ऐसा नहीं हो सकता है, ऐसी भी बात नहीं है. कोरोना की शुरुवात के काल में देश में एक भी पीपीई किट नहीं बनती थी और आज हम उसका निर्यात करने जा रहे हैं, बाबा राम देव के पतंजलि के उत्पाद आज बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पानी पिला रहे हैं, तो अन्य क्यों नहीं कर सकते. हमें चीन में बने माल को लाकर देश में खपाने की प्रवृति का परित्याग करना होगा. चीन का उत्पाद जब से हमारी बाजार में आना शुरू हुआ तभी से समझदार लोग इसे लेकर सचेत करते रहे हैं. प्रधानमन्त्री लगातार स्थानीय उत्पादों के प्रयोग पर जोर देते रहे हैं, इसके बाद भी इसमें लगे व्यापारियों और इसके उपभोगकर्ता जनता के कान नहीं खड़े हुए. अरे भाई जब चीन कर सकता है और दूसरे देश कर सकते हैं ,तब हम क्यों नहीं कर सकते.
अब चीन ने एक बार फिर हमें छेड़ने की हिमाकत की है जिससे देश का ध्यान एक बार फिर चीनी उत्पादों की ओर गया है और लोग स्वयंस्फूर्त रूप से उसके उत्पादों का वहिष्कार कर रहे है, राज्य सरकारें उसके साथ करार तोड़ रही है, उद्यमी उसके उत्पादों से दूरी बनाने को कह रहे है, आम जनता उसकी समानों का तोड़फोड़ रही है एवं उसका वहिष्कार कर रही है. अच्छी बात है, परन्तु इतनी ही काफी नहीं है. उद्यमियों को उक्त उत्पादों के भारत निर्मित विकल्प को सामने लाने के लिए कमर कसनी होगी और हर भारतीय आवाम को देशी उत्पादों का ही उपयोग करने का संकल्प लेना होगा और अपनी हर आवश्यकता की पूर्ति देश में ही बनाए उत्पादों से करनी होगी. साथ ही देश में बनाए उत्पाद गुणवत्ता और कीमत में ऐसे होने चाहिए जिससे वे उस क्षेत्र में दुनिया में निर्मित सर्वोत्तम उत्पाद से प्रतियोगिता कर सकें, जिससे हमारे उत्पादों की देश और दुनिया में मांग बढ़े और हम भी एक बड़े आयातक की बजाय एक बड़े निर्यातक बनें. यह कोई असंभव बात है ऐसा नहीं है. हममें ऐसा करने का दम है लेकिन हम आसान रास्ता अितयार कर चीन जैसे अपने गद्दार और और गैर भरोसेमंद पड़ोसी को मजबूत करते आये हैं. तो आइये अब अर्थव्यव्स्था के हर क्षेत्र में स्वदेशीकरण की अलख जगाएं और किसी भी परिस्थिति में ऐसे उत्पादों को हाथ ना लगाएं जो चीन जैसे हमारे दुश्मनों को मोटा करते हैं ऐसे उत्पादों का शुध्द देशी विकल्प तैयार करें और इसके माध्यम से देश की अर्थव्यव्स्था को मजबूत करें.
इससे देश समृद्ध होगा और देश के हर नागरिक का जन जीवन खुशहाल होगा. जो पैसा आयात करने के बदले देश से बाहर जाता है वह देश में लगेगा. निर्यात बढ़ने से देश की आय भी बढ़ेगी और देश के विकास का पहिया और भी तेजी से दौड़ेगा.

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