ऐसी गिरावट पर लगाम जरूरी

हमारे एक मित्र ने बड़ी धूमधाम से काफी पैसा लगा कर एक अस्पताल का अपनी दादी माँ के नाम पर निर्माण किया. मकसद समाज की सेवा करना था. बड़े तामझाम से उसका उदघाटन हुआ. देश-विदेश से निष्णात चिकित्सक नियुक्त किये गये. छह महीने में ही उन्हें उक्त अस्पताल को चलाने के लिए इस मामले में सिद्धहस्त एक निजी विदेशी कंपनी को सौंपना पड़ा. कारण उन्होंने जिस मिशनरी भावना से उक्त उपक्रम को शुरू करने का बीड़ा उठाया था उसका उन्हें एक भी कतरा अस्पताल में परिचारिकाओं से लेकर कर दक्ष चिकित्सकों तक किसी में भी नजर नहीं आया. जिस उदाा मानवीय संवेदना की अपेक्षा ऐसे व्यवसाय से की जाती है उसका कोई अता-पता नहीं है. यह शुद्ध धंधा बना गया है, जहां यदि आपके पास पैसा नहीं है तो आपका इलाज मुश्किल है. मरीज को भर्ती करने के पहले उसकी माली हालत की जाँच पड़ताल कर ली जाती है और भारी-भरकम अग्रिम जमा करा लिया जाता है. यदि आप सक्षम नहीं हैैं या उस समय आपके पास पैसा उपलब्ध नहीं है, तो आपको किसी और बहाने से टरका दिया जाता है, या आपके मरीज को तब तक अन्दर नहीं लिया जाता जब तक आप उक्त अग्रिम धनराशि की व्यवस्था कर, जमा नहीं करा देते और जिस तरह के बिल बनते हैं, विशेषकर इस कोरोना काल में, तो सुनकर ही जो मरीज नहीं है उसे भी गश आ जाए. भला हो सरकार की जिसने अब इन पर डंडा बरसाना शुरू किया है. आज देश और दुनिया में प्रतिकूल माहोल है, इसमें भी ऐसा अस्पताल चलाने वाले अपना लाभ अधिकतम करने के लक्ष्य से बाज नहीं आ रहे. इसका मतलब यह नहीं की आज अच्छे कर्तव्य दक्ष और आदमी को आदमी समझ कर उसका इलाज करने वाले और उचित पारिश्रामिक लेने वाले डॉक्टर है ही नहीं, पर उनकी संख्या मारीज को पैसा देने वाली मशीन समझेवालों की तुलना में काफी कम है. करोना काल में जो पूरी दक्षता, साहस और मानवता के साथ सेवा दे रहे हैं उनका स्वागत होना चाहिए. परन्तु जो इसे लूट का माध्यम बना रहे है और कुछ भी बिल बना रहे है, कुछ भी टेस्ट कर रहे है, उस ओर भी ध्यान देने की जरुरत है. साथ ही इस तरह की चर्चा भी समाज में आम हो रही है कि जो लोग इस महामारी का शिकार होकर अपनी जान गवां रहे है, उनके अंगों के साथ छेड़-छाड़ भी हो रही है, जिस पर भी ध्यान देना होगा. पहले भी मुंबई के एक बड़े अस्पताल में किडनी रैकेट का खुलासा हो चुका है. इसलिए कहीं कुछ भी संदिग्ध लगे तो उसकी तुरंत जांच होनी चाहिये. आपदा में अच्छा काम करने वाले सराहना के पात्र है, परतु आपदा से आर्त व्यक्ति को कमाई का जरिया मान कर अधाधुंध कमाई करने वाले सर्वथा निंदा और कड़ी कारवाई के पात्र है. चिकित्सा जैसे क्षेत्र में उससे सबन्धित लोगों में सेवा भावना का होना, संवेदना का होना नितांत आवश्यक है. कारण जो वहां पहुचता है वह काफी खराब हालत में होता है. सिर्फ पैसे के नजरिये से उसका मूल्यांकन ठीक नहीं है. उचित शुल्क भी लिया जाना जरूरी है परन्तु जरूरी ना होने पर सिर्फ कमाई के लिए शल्यक्रिया करना, टेस्ट पर टेस्ट कराना और फिर कुछ भी बिल बना देना अमानवीय है. सरकारी अस्पतालों की अलग कहानी है, वहां काम करने वालों में हर स्तर पर एक विचित्र प्रकार की उदासीनता पायी जाती है, उनमें वह मुस्तैदी नहीं दिखती जो इस व्यवासाय के लिये जरूरी है. एक जगह पैसा ही सब कुछ और दूसरी जगह उदासीनता का आलम तो ऐसे में मरीज क्या करे. इस ओर नीति नियंताओं को सोचना होगा. सरकारी हस्तक्षेप और सख्ती के बावजूद भी यदि इस तरह की बातें इस कोरोना काल में समाज में चर्चा का विषय है, तो इसका मतलब है कि सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है, जिस ओर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है. इनका संचालन और निरीक्षण प्रशासन द्वारा इस तरह हो, जिसे आपदा काल में या समान्य काल में इनका काम सही ढंग से हो और इनमे जो गिरावट दृष्टिगोचर हो रही है उस पर लगाम लगे.

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