सिर्फ चर्चा में बने रहने के लिए...

हम किसी भी बात का किस तरह बतंगड़ बना सकते है और बालू से भी पानी निकाल सकते हैं इसकी बानगी एक ताजा प्रकरण से समझ में आती है. वैसे राजनीति और प्रेम में सब कुछ जायज होने की कहावत काफी पुरानी है परन्तु उसमे भी कुछ मर्यादा है, जब उसमे सब कुछ सिर्फ चर्चा में बने रहने के लिए किया जाय और उसका हेतु सिर्फ कमियां निकालना और अपने आपको श्रेष्ठ साबित करना हो तब वह बेजा और अनावश्यक बन जाता है और वह चारों ओर से निंदा का, या लोगों के मनो-विनोद का पात्र बनता है हाल ही में राम मंदिर निर्माण के शिलान्यास की तारीख तय हुई है. न्यास ने प्रधानमंत्री से इसका शिलान्यास करने का अनुरोध किया जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा स्वीकारा गया है. सदियों से प्रलंबित देश की सनातन धर्मी आवाम का यह सपना पूरा होने जा रहा है. स्वाभाविक है कि इससे देश में एक आनंद के उत्साह का माहौल है. इसमे सबसे पहले सेंध लगाने का प्रयास रांकपा नेता शरद पवार ने किया, जिन्हे इसे ऐसा करने से नुकसान नजर आया. एक कार्यक्रम जिसमें देश के बहुमत की भावना जुड़ी हुई है, जो सीधा उनकी श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, और जो कार्यक्रम कोरोना महामारी के इस काल में उन सभी प्रतिबन्धों और मानदंडों का तंतोतंत पालन कर अयोजित किया जाने वाला है. वैसी तैयारी भी हो रही है. इसके बाद भी शरद पवार को नुकसान नजर आता है, तो यह समझ से परे है. इसका उन्हें यथोचित प्रतिसाद भी मिल रहा है. भाजपा एवं विहिप के नेता और आम जन जिस तरह उन पर पिल पड़े है यह सर्वथा उचित है. धर्म निरपेक्षता का मतलब हमे बताया गया है कि देश में रहने वाले हर धर्म के नागरिक को उसकी मरजी के अनुसार उसके धर्म के अनुपालन करने की स्वंतत्रता हो. जबकि हमारे तथाकथित निरपेक्षता वादियों ने उसका अर्थ अल्पसंख्यक समुदाय का तुष्टीकरण करने में लगाया. जिसका परिणाम यह हुआ कि आज वह देश में हाशिये पर है. इसके बाद भी इस तरह की बातें करना सर्वथा अनुचित एवं निंदनीय है. इस तरह की धर्मनिरपेक्षता के स्वांग से और मंदिर निर्माण के प्रति ऐसा भाव व्यक्त करने से देश का या प्रधानमंत्री का कोई नुकसान नहीं होगा. उल्टा शरद पवार जैसे नेताओं का ही नुकसान होगा. कारण शरद पवार जिस राजनैतिक विचारधारा और संस्कृति के प्रतीक हैं उस कांग्रेस का ही पूरा कारोबार भ्रम, गुटवाद और अनुशासनहीनता की भेंट चढ़ चुका है. रोज नई-नई कहानी जनता जानर्दन के सामने आ रही है. राजनीतिक विश्लेषक और उसके भविष्य के प्रति चिंतित उसके नेता यह कयास लगा रहे है कि वह बचेगी या डूब जायेगी. भाजपा का विरोध इन सबका जन्म सिद्ध अधिकार है, वह करें, लेकिन ऐसा करते समय यह भी ध्यान रखें कि अपने बयानों से जनता की संवेदना पर आघात ना करें. सिर्फ चर्चा में बने रहने के लिए या भाजपा से आगे बढ़ने के लिए अथवा मतदाताओं के एक वर्ग को खुश करने के लिए किये जाने वाले ऐसे विधान उस नेता और पार्टी का बेड़ा गर्क करते हैं. यह पवार जैसे अनुभवी नेता को समझना चाहिए. अब जब पवार बोलेगें तो बाबा लोग भी क्यों चुप रहे? तो कुछ बाबाओं ने भी शुभ मुहूर्त पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. भगवत भक्ति और लोक कल्याण के लिए भगवा धारण करने और सब कुछ त्यागने वाले इस आदरणीय वर्ग में भी कई गुट है जो ऐसे अवसरों पर अपना वर्चस्व चाहते हैं. वह नहीं मिला तो कुछ और ना कर सको तो किसी तरह कोई भी व्यवधान खड़ा करो. उन्हें यह नहीं भूलना चाहिये कि ऐसा कर वे भले ही कुछ दिन चर्चा में बने रह सकते हैं लेकिन भगवान और भक्त के बीच रोड़ा नहीं बन सकते. हां मीन मेख निकाल कर अपनी छीछालेदर जरूर कर सकते हैं.

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