इस नापाक गंठजोड़ का टूटना ही इलाज

उच्चतम न्यायालय ने गैंगस्टर विकास दुबे प्रकरण की सुनवाई के दौरान एक सारगर्भित और विचारोत्तेजक टिप्पणी की है कि यदि उसके खिलाफ अपराध के इतने अधिक मामले थे तो उसे जमानत कैसे मिली और वह कैसे खुला घूम रहा था. यह टिप्पणी यह जताती है कि जरायम पेशा लोग किस तरह का रसूख रखते है, किस तरह जिस व्यवस्था की उन पर जाबा कसने के लिए बनाया गया है उनकी ही पैरोकार और रक्षक बन गयी है. इसकी जड़ें कितनी गहरीं है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है. अभी कुछ दिन पहले कानपुर के ही दूसरे थाने के मुखिया को एक और अपराधी और मवेशी तस्कर की रिपोर्ट देने को कहा गया और उन्होंने ने भी उसे क्लीन चिट दे दी. बड़े अधिकारी के कान खड़े हुए, उन्होंने सी ओ से जांच कराई तो सूरते-हाल कुछ दूसरा नजर आया. गुमराह करने वाले पुलिस अधिकारी को निलंबित किया गया है. यह आश्चर्य जनक है कि यह मामला तब घटित हुआ है जब विकास दुबे से साठ-गांठ के आरोप में कई पुलिस वाले अन्दर हैं. उसके बाद भी उसी जिले के दूसरे थाने का अधिकारी उ€त तरह की करवाई करता है तो यह साफ है कि यह दशकों की सडांध इतनी गहरी है कि इसका इलाज समय लेगा. इसके लिए बड़े कठोर कदम और वह भी लगातार उठाने की जरूरत पड़ेगी. कारण ऐसी स्थिति किसी क्षेत्र विशेष की नहीं है बल्कि यह बीमारी देश व्यापी है. कई ऐसे नाम-चीन अपराधी हैं जिनके ऊपर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से दर्जनों मामले दर्ज है. उनके क्षेत्र में उनके नाम की दहशत है परन्तु ऐसी साठ-गांठ और मिली भगत के चलते वे सफेदपोश बनकर और निर्वाचित प्रतिनिधि बनकर चैन की बंशी बजाते है. जब कोई बड़ा हादसा या कानपुर जैसा जघन्य अपराध हो जाता है. थोडी बहुत हलचल होती है फिर सब शांत हो जाता है. यह अनायास ही नहीं कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने विकास दुबे प्रकरण में जांच में सेवानिवृत न्यायधीश को शामिल करने का सुझाव दिया है. जिसे उत्तरप्रदेश सरकार ने माना है कारण ऐसी घटनाएं और एक जरायम पेशा व्यक्ति की ऐसी अवस्था कि वह क्षेत्र विशेष के लोगों का जीवन हराम कर दे और उसकी कोई सुनवाई ना हो. कारण पुलिस जनता की नहीं अपराधी की सुन रही है. उसे आश्रय दे रही है. अराजकता को निमंत्रण देने जैसा है. यही नहीं इस तरह की खबरें भी सुर्खियाँ बन रही है की विकास के गिरफ्तार साथी जेल से भी अपनी चला सकते है. यह कोई नयी बात नहीं है हमारे देश के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे जहाँ बाहुबली, दबंग और तथा अपराधी छवि वाले लोग जेल में ही रहते चुनाव जीत लेते है. जेल में रहने के बाद भी उनकी इतनी रिट चलती है कि क्षेत्र में कोई प्रचार करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता. यह सब इसलिए है कि नेता-अधिकारी और अपराधी गंठजोड़ टूट नहीं पा रहा है. इसने पूरी व्यवस्था को जकड़ लिया है जिस पर निर्णायक प्रहार जरूरी है. किसी अपराधी को यह लगे की वह कुछ भी कर सकता है और वह सुरक्षित रह सकता है तो फिर इससे बड़ी दु:खद स्थिति कानून व्यवस्था के लिए और क्या हो सकती है. योगी सरकार ने इस दिशा में शुरू से सख्त पहल की, परन्तु व्यवस्था के रक्षक ही जब विकास जैसी कलंक की रक्षा करते रहेंगे तो फिर उस पर कैसे लगाम लगेगी. उत्तरप्रदेश में जैसी सघन जांच हो रही है, करवाई हो रही है वैसे ही देश व्यापी अभियान की जरूरत है. इस नापाक गठबन्धन को तोड़ना और यह सख्त संदेश देना कि ऐसी कोई भी ढील या गंठजोड़ बर्दाश्त नहीं होगी, वक्त की मांग है अपराधी या उसका रक्षक या प्रश्रयदाता वह चाहे कितना भी बड़ा क्यों नो हो उसे बशा नहीं जाना चाहिए. हर संभव कड़ी और प्रभावी कारवाई अनिवार्य है.

Post a comment

[blogger]

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget