अस्थिर बाजार में किस पर दांव लगाना सुरक्षित?

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कोरोनवायरस महामारी के धीमा पड़ने के कोई संकेत फिलहाल नहीं दिख रहे हैं, ऐसे में निवेशकों ने बाजार में उतार-चढ़ाव की ऐसी अवधि में निवेश विकल्प कम होने पर चिंता शुरू कर दी है। एक संपत्ति के रूप में सोना हासिल करना आज भी भारत में एक अलग आकर्षण को कायम रखा है।
सुरक्षित विकल्पों से जुड़े बारहमासी प्रश्न ने एक बार फिर इक्विटी बाजार और सोने के बीच तुलना करने को मजबूर किया है। पिछले 10 वर्षों में दोनों बाजारों की ग्रोथ ट्रैजेक्टरी हमें यह बता सकती है कि अनिश्चितता के वर्तमान समय में बेहतर विकल्प क्या है।

दशक की बात: इक्विटी और सोने के बाजारों के ट्रेंड:
पिछले 10 वर्षों में, भारतीय सूचकांक जैसे सेंसेक्स (बीएसई 30) और बीएसई-500 ने क्रमश: 9.05 प्रतिशत और 8.5 प्रतिशत का सीएजीआर दर्ज किया है। हालांकि, 2010 और 2015 के बीच की अवधि में 2012 की आर्थिक मंदी के बावजूद एक क्रमिक वृद्धि देखी गई - बाद में फरवरी 2016 से जनवरी 2020 तक वृद्धि देखी गई है। दिसंबर-2019 तक सेंसेक्स की वृद्धि लगभग 17,500 अंक से बढ़कर 40,000 अंक तक पहुंच गई, जो पूरे सेक्टर में इक्विटी से आए धन को बताता है, हालांकि इस बीच वैश्विक रुझानों के कारण उतार-चढ़ाव भी हुआ।
कोविड-19 के प्रसार के बाद वैश्विक बाजार ध्वस्त हो गए, क्योंकि इसने सभी आर्थिक गतिविधियों और पैसा कमाने की संभावनाओं को प्रभावी ढंग से रोक दिया। इसके परिणामस्वरूप अप्रैल-2020 की शुरुआत तक भारतीय बाजार भी ढह गए और 23 प्रतिशत से अधिक यानी 27,400 बेस अंक तक गिर गए। अधिकतम गिरावट 40 प्रतिशत के आसपास थी। हालांकि, अप्रैल के बाद से रिकवरी काफी महत्वपूर्ण रही, उभरते बाजारों में उभरते ट्रेंड्स पर निवेशकों के रुख की वजह से यह देखने को मिला। दूसरी ओर, सोने के बाजारों में तेज वृद्धि देखी गई है। लोग अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाने के लिए सोने का उपयोग करते हैं, खासकर जब संकट उभरने के संकेत थे। 2008 में सोना 8,000 से 25,000 की ओर पहुंच गया था, जबकि 2016 के बाद सोने की कीमतें 31,000 रुपए प्रति 10 ग्राम सोने से भी आगे बढ़ गई।
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