बाल की खाल निकालने का समय नहीं

बुलंद शहर के एक छोटे से गाँव की एक लड़की जिसने अपनी क़ाबलियत के बूते बारहवीं की परीक्षा में एक कीर्तिमान बनाया और अपने दम पर अमेरिका में भारी भरकम छात्रवृति प्राप्त की. जिसका सपना देश के ग्रामीण अंचलों की लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा करने में मदद करना था. वह उसके लिए कोचिंग वगैरह भी संचालित कर रही थी जो असमय काल के गाल में समा गयी. कारण जिस बाइक पर वह अपने भाई या चाचा के साथ जा रही थी, वह इसलिए दुर्घटना ग्रस्त हो गयी कि कुछ मनचले उसका पीछा कर रहे थे. अब स्थानीय पुलिस इस पर यह मुद्दा बना रही है कि उसने हेलमेट नहीं पहना था, गाडी उसका चाचा नहीं उसका भाई चला रहा था इसलिए ऐसा हुआ है. माना कि उसने हेलमेट नहीं पहना था, उसे पहनना चाहिये था. यह भी माना कि उसका भाई बाइक चला रहा था परन्तु इससे मनचलों की छेड़खानी का पातक तो कम नहीं होता. हो सकता है कि हेलमेट न पहनने के कारण यदि पुलिस उसे रोकती तो उस पर जुर्माना होता, उसकी जान तो नहीं जाती. आज उसका पूरा परिवार शोक में डूबा तो नहीं होता, अब उन बच्चों का क्या होगा जिनका रोल माडल बनकर वह उन्हें नयी राह दिखा रही थी? तो पुलिस बाल की खाल निकालने के बजाय उन मनचलों पर कारवाई करे, जो ऐसा कर लोगो के जीवन से खिलवाड़ कर रहे है. ऐसी गंभीर वारदात के बाद उसमें मीनमेख निकालने की पुलिसिया प्रवृत्ति ही वह कारण है जिसके चलते लोग थाने में जाने से आज भी कतराते है. यही रवैया महिलाओं पर होने वाले अत्याचार कम नहीं होने दे रहे है. देश में स्त्री-पुरुष औसत का यह आलम है कि केंद्र और राज्य सरकारें और समाजशास्त्री भी चिन्तित है. हमारे समाज की महिलाओं के प्रति दकियानूसी अवधारणा को बदलने के लिए समाज व समाज सुधारक और सरकार शतकों से प्रयास कर रही है. प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ अभियान शुरू किया है और तमाम तरह की सहूलियतें और अधिकार दिए गये है, और सतत दिए जा रहे है, फिर भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। पहले से ही देश की महिलाएं और बच्चियां तमाम तरह के उत्पीड़न का शिकार हैं. भ्रूण हत्या, दहेज़ की बलिबेदी पर कुर्बानी, बेटा-बेटी में भेदभाव, बलात्कार आदि तमाम ऐसे कुकृत्य क्या कम थे? जो अब मनचलों ने भी जीना मुहाल करना शुरू किया है. आवश्यक है कि प्रशासन इस बिंदु पर हर संभव गंभीरता दिखाए. मामले की संवेदनशीलता को समझे और उसका इस तरह से निदान करे कि ऐसे हादसे दुबारा ना हों. देश के विकास के लिए हमारी आबादी की आधी महिलाओं का हर तरह से सुशिक्षित होना और सुरक्षित होना जरूरी है. दुर्भाग्य से हमारी संस्कृति में इनको वह न्याय नहीं मिला और हमारे देश की महिलाओं के कई बिंदुओं पर पीछे रहने के जो कारक है, उनमें से यह एक हैं. इस ओर उसी तरह का ध्यान समाज और प्रशासन दोनों को देना होगा. उनके खिलाफ किसी भी तरह के अमानवीय या अपराधिक कृत्य का कड़े से कड़ा प्रतिकार करना होगा. कानून तो बहुत बने हैं, समाजिक जागरुकता अभियान भी हर स्तर पर सतत जारी है, परन्तु इसके बाद भी नित-नयी लोमहर्षक वारदातों का होना यह जताता है कि अभी भी सब कुछ ठीक नहीं है. कानून लागू करनेवालों को और सख्त होना चाहिए. मनचलों और अन्य कुकर्मियों पर सख्त करवाई जरूरी है, जिससे जिस तरह बेख़ौफ़ होकर वह अपने काले कारनामों को अंजाम देते है उससे बाज आयें. 

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