कांग्रेस की वही कहानी

कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी को समाप्त करने और पार्टी के नये अध्यक्ष के नाम पर मुहर लगाने के लिए कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में लगभग सात घंटे महामंथन हुआ लेकिन इसमें कुछ भी हासिल नहीं हुआ। इसके विपरीत इस बैठक में खूब कीचड़ उछला जो पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं पर पड़ा। अंतत: देखने को मिला कि एक तरफ गांधी तो दूसरी तरफ 'बागी' नजर आने लगे। मजबूरन पार्टी ने सोनिया गांधी को ही अंतरिम अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला ले लिया।
2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों में अध्यक्ष की तलाश शुरू हो गई थी। पहली पार्टी थी भाजपा, जिसके अध्यक्ष अमित शाह लोकसभा चुनाव जीत चुके थे और गृह मंत्री बन गए थे। तब पार्टी को लगा था कि एक व्यक्ति दो जिम्मेदारियां नहीं संभाल सकता। दूसरी पार्टी थी कांग्रेस। क्योंकि, लोकसभा चुनाव में बुरी हार के बाद राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी।
उसके बाद हुआ ये कि जेपी नड्डा के रूप में भाजपा ने तो अपना नया अध्यक्ष चुन लिया। लेकिन, राहुल के इस्तीफे के बाद कांग्रेस को दोबारा सोनिया गांधी की शरण में जाना पड़ा। पिछले साल अगस्त में जब सोनिया गांधी फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनीं, तो सवाल यही उठा कि क्या कांग्रेस में गांधी परिवार के अलावा किसी और को अध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता। कांग्रेस में अक्सर गैर गांधी को अध्यक्ष बनाने की मांग उठती रही है।
इस बीच फिर से कांग्रेस में बदलाव की मांग तेज हो गई थी। खुद प्रियंका गांधी ने भी एक किताब को दिए इंटरव्यू में कहा है कि अब किसी गैर-गांधी को पार्टी का नेतृत्व संभालना चाहिए। इस संकेत के बाद माना जा रहा था कि सोमवार को कार्यसमिति की बैठक में नये अध्यक्ष का चुनाव हो जाएगा लेकिन ऐसा हो न सका।
कांग्रेस का अध्यक्ष चाहे सोनिया बनें, राहुल बनें या फिर प्रियंका गांधी बनें। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गांधी परिवार वाकई चाहता है कि कांग्रेस मूल्यों की जड़ों को मजबूत करे। कांग्रेस अगर चाहती है तो उसे रणनीति के साथ व्यवहार में भी बदलाव दिखाना होगा, क्योंकि भावहीन राजनीति मूल्यहीन हो जाती है, इसलिए राजनीति में देश की भावनाओं का उचित सम्मान होना चाहिए लेकिन किसी पार्टी का भावनाओं से दिग्दर्शित होना न सिर्फ पार्टी के लिए, बल्कि पार्टी के लिए भी घातक हो सकता है। कांग्रेस के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पिटने केबाद इसके अध्यक्ष का व्यवहार एक ऐसे रूठे व्यक्ति जैसा प्रतीक हो रहा है जो कह रहा है- चलो मेरे बगैर चुनाव जीतकर दिखाओ और पूरी पार्टी उन्हें यह कहकर मना रही है कि- हारने की जिम्मेदारी भी हमारी है बस, अब आप मान जाओ। इस तरह का इमोशनल ड्रामा तभी काम आता है जब जड़ें गहराई में धंसी हों। कई चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस की जड़ें हिल चुकी हैं, इसलिए आम लोगों में यह धारणा बन गई है कि कांग्रेस अनिर्णय की शिकार हो गई है। जिन लोगों ने कांग्रेस को वोट देने का सिलसिला बनाए रखा है वह भी खुद को ठगा सा महसूस करते होंगे।
कांग्रेस ज्यादातर गांधी परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। इंदिरा गांधी ने जिस तरह से इसको आगे बढ़ाया और कुशल नेतृत्व प्रदान किया उसमें एक परिवार का महत्व बढ़ता चला गया। कांग्रेस इस परिवारवाद की समस्या से न तो निकली और न ही कभी निकलना चाहा। कांग्रेस अक्सर इस तरह के जटिल प्रश्नों के जवाबों को टालती रही है। देश का एक तबका आज भी यही चाहता है कि कांग्रेस की वापसी हो, लेकिन ये खुद पार्टी को ही तय करना होगा कि वो ऐसा करेगी या नहीं।
बीते कुछ वर्षों से लगातार गिरता कांग्रेस का ग्राफ इस बात को बताता है कि वह अपनी जड़ों से कटती चली गई है। पहले टॉप टू बॉटम जो पार्टी की कार्यशैली रही थी वो खत्म हो गई है। बीते पांच से सात वर्षों के अंदर कांग्रेस में युवाओं की भागीदारी लगातार गिरी है। यह अटल सत्य है कि वर्तमान में कांग्रेस का अध्यक्ष गांधी घराने से बाहर का व्यक्ति बना तो देश की सबसे पुरानी इस पार्टी को खंडित होने से कोई नहीं बचा सकता।

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