ठीक नहीं है यह क्षेत्रवाद की बयार

किसी भी क्षेत्र पर उसके मूल रहिवासियों का पहला अधिकार है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता. लेकिन उसका एकाधिकार है यह कहना या कानूनी रूप से सुनिश्चित करना, देश की भावनात्मक एकता के हिसाब से कितना सुसंगत है इस पर अब देश में बहस की जरूरत है. कई
राज्यों के अपने डोमिसाइल कानून है. दूसरे राज्य का व्यक्ति वहां तभी सरकारी सुख सुविधाएं पा सकता है जब उसने वहां रहने का एक नियत समय पूरा किया हो. यह भी पूरी तरह से सही नहीं कहा जा सकता. परन्तु यह चलता था, देश का संविधान किसी भी भारतीय को देश में कहीं भी आने-जाने, रोजी-रोटी कमाने एवं बसने का अधिकार देता है. लोगों के एक राज्य से दूसरे राज्य में आने के दो कारण है, पहला यह कि जिस राज्य में वे मूल निवासी है वहां औद्योगीकरण कम होने से या अन्य कारणों से रोजगार के उतने अच्छे अवसर नहीं है जितने कि उन राज्यों में है जहां वे जाते है, और दूसरा इन राज्यों में मजदूरों और कर्मचारियों की मांग ज्यादा है जो उन राज्यों से पूरी नहीं हो रही है. कोई भी व्यक्ति अपनी मूल धरती आसानी से नहीं छोड़ता. मजबूरी में ही अपना आशियाना छोड़ता है. ऐसे लोगों पर तमाम प्रतिबन्ध लगाना और अपने ही देश में ही पराये होने का एहसास दिलाना किसी भी दृष्टि से सही नहीं है. धरती पुत्रों को प्राथमिकता मिलनी चाहिये और वह मिलती ही है. उस पर कानूनी जामा पहनाने का प्रयास जो नेता वोट के लिए करते है व अपनी और अपने पार्टी की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए करते है, यह कदापि सही नहीं है. मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ ने सरकारी नौकरियों में 75 फीसदी स्थान, स्थानीय लोगों को देने की बात की थी. अब शिवराज सिंह शत-प्रतिशत सरकारी नौकरियों मे स्थानीय लोगों को स्थान देंने की बात कर रहे है. इसपर कानून बनाने की घोषणा कर रहे है, जो किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता. राजनीति का मकसद सिर्फ किसी भी तरह सडाा प्राप्ति नहीं है बल्कि सडााधीश का यह लक्ष्य होना चाहिये कि उसकी नीतियों से उसके राज्य की जनता का हर संभव कल्याण हो. साथ ही साथ विभिन्न राज्यों के नागरिकों के मध्य भावनात्मक एकता भी पुष्ट हो. मजबूरी में वे यदि किसी राज्य में पहुंचते है तो उनका अपनों की तरह स्वागत हो. इस देश के केंद्र का शुरू से यही प्रयास रहा है कि लोगों का अधिकाधिक आवागमन हो, एक दूसरे के संपर्क में आयें और रोजी-रोटी के सबन्ध बनाये, जिससे भारतीयता की भावना और प्रगाढ़ हो न कि ऐसे नियम कानून बनाए कि लोग अपने अपने क्षत्र में ही सीमित रहे और कूपमंडूकता का शिकार हो जाएँ. जहाँ अवसर है, वही लोग जाते है और जहां जाते है उनकी वहां जरूरत है. जहाँ रहते है अपने श्रम से खुद को खुशहाल करते है और उस देश और राज्य को भी निखारते है. कोरोना काल में बड़े पैमाने पर मजदूर अपना कर्मस्थल छोड़कर अपने मूल स्थल जाने को बाध्य हुए थे, आज जब काम व उत्पादन पुन: शुरु हो रहा है, तो लोग मजदूरों को बुलाने के तमाम प्रयास कर रहे है, टिकट भेज रहे है और अन्य सुविधायें देने का भी वादा कर रहे है. फिर भी लोग नहीं आ रहे है इसलिए काम ठीक ढंग से शुरू नहीं हो पा रहा है. साफ़ है कि धरती पुत्र श्रमिक की मांग पूरा करने में असमर्थ है. तो कानून बनाना भले ही कुछ मत दिला दे, लेकिन यह मांग की आपूर्ति नहीं कर सकता. जो लोग क्षेत्रवाद के मद में लोगों को जोड़ने की बजाय तोड़ने का काम कर रहे है. कोरोनाकाल उनके लिए इशारा है. क्षेत्रवाद का प्रचार लम्बे समय में किसी भी क्षेत्र का भला नहीं कर सकता और प्रकारांतर से यह देश के लिए ठीक नहीं है. आरक्षण या कोई भी बन्धन ठीक नहीं है, यह प्रतियोगिता को रोकता है जो गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है. और सामजिक समरसता एवं भावनात्मक जुड़ाव को प्रभावित करता है.
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