इस दुरावस्था का स्थायी समाधान जरूरी

मुंबई और आस-पास के स्थानीय निकायों के रहिवासियों की यह नियति बन चुकी है कि उन्हें वर्ष दर वर्ष अपने -अपने इलाके में बारिश के समय जल-जमाव और गड्ढों से भरी सडकों पर हिचकोलों का आनंद लेना है. तमाम सख्ती, जांच होने और ठेकेदारों एवं अभियंताओं पर दबाव बनाने की बातें सुर्खियाँ बनी और कारवाई भी हुई. परन्तु इस वार्षिक कार्यक्रम पर कोई असर हुआ ऐसा नहीं लगता. अभी कुछ इलाकों में गणेशोत्सव पर गड्ढे पाटने का काम बड़ी तेजी से हुआ, लेकिन गत दो दिनों की बारिश में वह सब बह गया. ऐसा शानदार प्रदर्शन हमारे यहाँ के ठेकेदार और अभियंता ही कर सकते है. जनता जो कोरोना काल के इस समय में जब लोकल जैसी लाइफ लाइन बंद है. सड़क मार्ग का एकमात्र उपलब्ध विकल्प अपनाने को बाध्य है. वह मुंबई, पालघर, ठाणे, पनवेल चाहे जहां रहता है वहां का हर टैस समय से भरता है, नही तो उसपर ब्याज और जुर्माना भरना पड़ता है. इसके ऊपर से उसे टोल टैक्स भी अनिवार्य रूप से देना पड़ता है. इसके बाद जब व्यक्तिगत या सार्वजनिक साधनों से वह सड़क पर निकलता हो तो उसे अपने वाहन और सेहत की सलामती के लिए भगवान की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है. जल जमाव और गढ्ढे दोनों मिलकर उसकी और उसके गाडी की हालत खराब करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते. इस दारुण स्थिति का जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ स्थानीय निकाय प्रशासन है. इस पर विडंबना यह है कि मुंबई और आसपास के ये निकाय देश में समृद्ध निकायों में गिने जाते है. परन्तु उनकी यह समृद्धता उनके काम में कहीं भी नजर नहीं आती. इस मामले में वे काफी गरीब नजर आते है. इनके जन प्रतिनिधियों का नाम नगर सेवक है, लेकिन जैसी सेवा इनके नेतृत्व में दी जाती है उसकी बानगी आप मुंबई और आसपास के हर क्षेत्र में प्रवेश करते ही देख सकते है. जब मुख्य मार्गों की यह हालत है, तो गली-कूचों की क्या स्थिति होगी? इसका सहज ही अनुमान लगया जा सकता है. भ्रष्ट जनप्रतिनिधि, नौकरशाही और ठेकेदार इनके गंठजोड़ से भयभीत जनता को चुप और उदासीन रहने को बाध्य है. जिसका मुख्य कारण है इन निकायों को वह काम अच्छी तरह से नहीं करने दे रहा है, जिसके लिए इनका जन्म हुआ है. इनकी स्कूल, अस्पताल के बारे में यह आम भावना है कि यदि ये स्थानीय निकाय संचालित है, तो दोयम दर्जे के है. कोई समर्थ होने पर वहां नहीं जाना चाहता, वह मजबूरी का विकल्प है. इनका मुख्य काम उक्त कामों के आलावा साफ-सफाई, बाग़वानी, रास्ता सही रखना, जल निकासी सुनिश्चित करना और सही रखना है. इन कामों में घटियापन कैसे लाया जा सकता है इसकी मिसाल हर स्थानीय निकाय क्षेत्र में आपको देखने को मिल जायेगी. संकेत साफ़ है कि मौजूदा व्यवस्था में ये अपना कोई भी दायित्व इस तरह नहीं संपादित कर रही है. जिसे स्तरीय कहा जा सके और जनता की सही सेवा करता हो. आज आवश्यक है कि इनकी जबाबदेही के लिए कुछ नए तरीके अपनाने का विचार जिम्मेदार लोगों और नीति निर्धारकों को करना होगा. कारण यह चित्र एक बार नहीं बल्कि बार-बार होता दिख रहा है. यह इनके मानसून पूर्व की गयी तैयारियों को पूरी तरह खाना-पूर्ति की गयी ऐसा बताता है. तो इस गंठजोड़ को तोड़ना और उसी तरह से जबाबदेह बनाना और ऐसी वैकल्पिक पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित करना जो इनके कार्यों के स्तर को सुधार सके और जनता का आवागमन सही कर सके अत्यावश्यक है. जनता को भी एकजुट होकर अपनी बातें शांतिपूर्ण ढंग से सबंधित लोगों तक पहुंचाने की पहल करनी चाहिए. सब कुछ झेलेने की प्रवृत्ति प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं है. सक्रिय नागरिक सरकार को भी सक्रिय रखता है. प्रजातंत्र में असली मालिक जनता है परन्तु उसकी उदासीनता, उसकी निष्क्रियता और मत देते समय विवेक त्याग ही ऐसी स्थिति बना रहा है कि उसे जान हथेली पर लेकर बाहर निकलना पड़ता है. आवश्यक है कि नीति नियंता और सरकार स्थानीय निकायों की ऐसी दुरावस्था और घटिया कारोबार पर ध्यान दे और इसका स्थायी समाधान करे.

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