अब चीन को याद आ रहा पड़ोसी धर्म

चीन का लद्दाख पर दुस्साहस अब उसे भारी पड़ रहा है. जिस तरह का आक्रमक, दृढ़ और सतत प्रतिकार हमारे द्वारा किया जा रहा है वह अभूतपूर्व है. यह चीन के लिए अप्रत्याशित भी है. अब जिस तरह हमने उसकी कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक रूप से घेराबंदी की है और जिस तरह अमेरिका इंडो चाइना सी में लगातार उसे ललकार रहा है, उससे यह साफ़ है कि अपनी विस्तारवादी और चौधराहट वाली नीतियों से वह छोटे देशों को कर्ज के जाल में फंसाकर अपना उल्लू सीधा करने का जो ख्वाब देखा था वह दिन के उजाले की तरह दुनिया के सामने उजागर हो गया है. पाक को छोड़ नेपाल और श्रीलंका जैसे देश जिन्हें अपने पाले में करने के लिए उसने काफी पापड बेले थे, अब उससे किनारा कर रहे है. नेपाल के प्रधानमंत्री ओली जो चीन के उकसाने पर हमारे खिलाफ काफी उछलकूद कर रहे थे, वह अपने ही देश के आंतरिक दबावों और हमारे दृढ़ प्रतिकार के चलते राह पर आ रहे है. उन्हें धीरे धीरे चीन का असली चेहरा समझ में आ रहा है. श्रीलंका तो अब हमारे साथ रिश्ते को प्रथम क्रमांक पर रख रहा है. हंबनटोटा बंदरगाह गवाने के बाद उसको सद्बुद्धि आ रही है. यह अभिनंदनीय बात है, आज चीन चारो ओर से घिरा हुआ है, ताइवान जैसा देश भी उसे ललकार रहा है. जिस चीन ने बड़े जोर शोर से हमारी जमीन हड़पने का षडयंत्र रचा था आज खुद चारो ओर से घिरा है. वह जान चुका है कि अब उसके द्वारा की गयी कोई भी एक गलती या दुस्साहस उसे घातक परिणाम का स्वाद चखा सकता है. इसलिए वह अब नरम रुख अख्तियार कर रहा है. संकेत यह है कि वह ऐसा कोई मार्ग ढूंढ रहा है जिससे उसकी लाज भी बच जाय और हमारे साथ तनातनी भी खत्म हो जाय. इसलिए बातचीत में तरह-तरह के प्रस्ताव समाने रख रहा है.
जबकि हम बार-बार और स्पष्ट शब्दों में यह कह चुके हैं कि चीन को पिछले मई तक की स्थिति तक वापस जाना होगा. जिसका मतलब है कि उसे फिंगर आठ तक के इलाके से वापस जाना होगा. यदि कूटनीतिक और अन्य स्तर पर हो रही बातचीत से माने तो ठीक, नहीं तो अन्य विकल्प अपनाने का स्पष्ट संकेत भी सतत और स्पष्ट रूप से हमारी सरकार और सुरक्षा बलों द्वारा दिया गया है, और दिया जा रहा है. यह अनायास ही नहीं है कि उनके राजदूत हमारे देश में एक निजी चैनल को दिए अपने साक्षात्कार में यह कह रहे है की एक-दो घटनाओं से एक पड़ोसी को दूसरे पड़ोसी से दुश्मन की तरह नहीं ट्रीट करना चाहिए. अरे भाई भारत ने कब किसी दूसरे देश के साथ दुश्मनी करने की पहल की है. चीन जैसे गद्दार, धोखेबाज पर भी बार-बार भरोसा करने का प्रयास और पहल की है. जबकि चीन हमेशा 'मुंह मे राम बगल में छुरी' की नीति अपनाता रहा है और अपनी कठपुतली पाक का इस्तेमाल करता रहा है. हमारे खिलाफ उसके हर कुकृत्य का समर्थक रहा और आज भी हमारी जमीन अपनी बताने का दुस्साहस उसने किया है. जब हमने उसे उसकी जाति बताना और उसकी नस दबाना शुरू किया तो उसे यह एहसास हो रहा है कि अब उसकी दाल नहीं गलानेवाली. तो अब पड़ोसी धर्म और दोस्ती सब याद आ रही है. जबकि जब-जब हमने पड़ोसी धर्म निभाने का प्रयास किया तो उसने धोखा ही दिया है. अब समय आ गया है कि वह पड़ोसी धर्म का परिचय दे और पिछले मई की स्थिति पर वापस जाए. उस पर भरोसा हो सकता है ऐसा कुछ करके तो दिखाए, रही बात हमारी तो हमें जो करना है कर रहे है. चीन बातचीत से माना तो ठीक, नहीं तो प्रधानमंत्री बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि हम अपनी एक इंच जमीन भी नहीं जाने देंगे. अब बाजी चीन के हाथ में है. यह उसे ही तय करना है कि वह कैसे फिंगर आठ तक के इलाके से वापस जाएगा, प्यार से या रार से. हमारी तो दोनों तरह से उसे वापस भेजने की तैयारी है.

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