रसिया, योगी, छली, बली... सब हैं कृष्ण!

krishna
अधिकांश लोगों को कृष्ण, देवकी और वसुदेव की संतान मात्र लगते हैं, जिनका लालन-पालन गोकुल के नंद की पत्नी यशोदा ने किया। जिन्होंने गोकुल में जी भर कर बाल - लीलाएं की, जो बरसाने की राधा पर इस कदर रिझे की कृष्ण से राधा बनने को तत्पर हो गए। जिन्हें गोपियों के माखन से लेकर वस्त्र चुराने तक एक लौकिक आनंद प्राप्त करने में बड़ा आनंद आता था। 
कृष्ण केवल इन्हीं रूपों तक सीमित नहीं हैं, इनके अतिरिक्त भी उनके और बहुत से रूप हैं । कृष्ण एक ऐसे पौधे की तरह हैं जो उगता कहीं और है, पनपता तथा विकसित कहीं और होता है तथा अंत में अपनी जड़े कहीं और फैलाकर अपनी लीला समाप्त कर गौलोकवासी हो जाता है। कृष्ण का एक रूप धीरोद्दात नायक का है जिसमें लालित्य है , मस्ती है, जो श्रंगार भावों से पूरी तरह संपृक्त है । तो दूसरा रूप एक महायोद्धा का है उनका यह योद्धत्व किसी एक कालखंड में नहीं समाया है। वह जब बाल क्रीड़ा करते हैं तब ही पूतना जैसी राक्षसी का वध कर देते हैं। यमुना में छिपे बैठे कालिया नाग का मान - मर्दन करते हैं । शकटासुर का वध करते हैं और इतना ही नहीं 14 वर्ष के होते - होते अविजेय माने जाने वाले अपने मामा कंस का ही वध नहीं करते अपितु उसके अनेक मल्ल, पहलवानों एवं मायावी राक्षसों को भी यमलोक पहुंचा देते हैं।और मथुरा से द्वारिका जाने के बाद चक्रवर्ती राजा बनते हैं। अनेक दुष्ट राजाओं एवं योद्धाओं का मान मर्दन ही नहीं करते अपितु उनका वध भी करते हैं। 
कृष्ण का पराक्रम शिशुपाल वध से और भी अधिक निखर कर सामने आता है लेकिन कृष्ण केवल योद्धा मात्र नहीं हैं। वह चतुर राजनीतिज्ञ, कुशल प्रशासक व व्यवहारिक शासक होने के साथ-साथ दुष्ट हंता एवं धर्म के रक्षक भी हैं। वह अपने मित्रों, बंधु बांधवों का हर तरीके से रक्षण करते हैं। स्त्रियों के मान की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की बाजीतक लगा देते हैं तो वही उन्हें जबरदस्ती अंकशायिनी बनाने वालों को धूल चटाते हैं। कृष्ण नई परंपराओं एवं नीतियों के प्रवर्तक भी बन कर सामने आते हैं। 
वें केवल सिद्धांतवादी, आदर्शवादी नायक बनकर नहीं रहते अपितु जब जैसा करके कार्य की सिद्धि हो वैसा ही कदम उठाते हैं। मौका मिलने पर वें रुमणी का अपहरण भी करते हैं एवं जब जान पर बन आए तो रणछोड़ कर भाग भी जाते हैं। कृष्ण के कितने रूपों को किस तरह से वर्णित किया जाए वेंअनंतरूपी हैं, उनकी माया अगम्य है। उनके एक - एक शब्द एवं कार्य में कोई रहस्य एवं भविष्य की योजना छिपी रहती है । कृष्ण निरर्थक कोई भी कार्य नहीं करते। एक शब्द भी बिना प्रयोजन नहीं बोलते यदि वें बंसी भी बजाते हैं तो उसमें भी एक गहरा रहस्य होता है। एक ओर जहां अपनी बंसी से वह ग्वालों का मनोरंजन करते हैं, गोपियों को लुभाते हैं वहीं शौर्य के साथ मधुरता एवं लालित्य का संदेश भी देते हैं। कृष्ण एक गौ - पालक के रूप में भी अपना कार्य उत्कृष्टता के साथ करते हैं। उनका गौ-पालन केवल तात्कालिक प्रयोजन सिद्धि का कार्य नहीं है अपितु गौ - रक्षा एवं गौपालन के द्वारा भी वे एक भविष्य निर्माण एवं अर्थव्यवस्था की संपुष्टि का विराट संदेश बहुत सादगी के साथ दे जाते हैं। यह तो था कृष्ण के बहु - आयामी व्यक्तित्व का एक रूप। अब कृष्ण को आध्यात्म की दृष्टि से देखें तो भी कृष्ण भव्य एवं दिव्य होकर सामने आते हैं । कृष्ण महाभारत के युद्ध से पूर्व अर्जुन के मोहभंग के लिए श्रीमद्भागवत गीता का ऐसा उपदेश देते हैं जो सर्वकालिक एवं सर्वहित का अमृत बनकर जन - जन एवं कण-कण में समा जाता है। कृष्ण आत्मा की अजरता एवं अमरता को इतनी सरलता से प्रतिपादित करते हैं कि उनसे पहले और उनके बाद कोई और ऐसा नहीं कर पाया। 
जब पार्थ मोह वश अपने बंधु - बांधवों एवं अंग्रेजों का वध करने का रुदन करते दिखते हैं तब कृष्ण उन्हें नैनं ङ्क्षछदंति शस्त्राणि नैनंदहति पावक: नैनं शोषयति मारुत: का दिव्य ज्ञान देकर उनके अंतर्चक्षु खोल देते हैं। जब कृष्ण कहते हैं 'यदा -यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, तदात्मानं सृजाम्यहम कहकर धर्म की रक्षा की ध्वजा को ऊंचा करते हैं । कृष्ण धर्म संस्थापनार्थाय के साथ-साथ विनाशाय च दुष्कृतां का सिद्धांत भी प्रतिपादित करते हैं । कृष्ण वेशभूषा से लेकर खान-पान तक सब में एक सात्विकता का शाश्वत संदेश देते हैं। उनकी वेशभूषा में एवं खानपान में सादगी है तो उनके स्वर्ण मुकुट में भव्यता भी है। एक तरह से देखें तो कृष्ण सादगी में भव्यता का अद्भुत समावेश है।सर का मोर मुकुट प्राणी जगत को सम्मान देता है तो ओंठो की बांसुरी संगीत के प्रति उनके अनुराग की प्रतीक, वहीं सुदर्शन चक्र नवोन्मेषी शस्त्र आविष्कार का संदेश है। यदि संक्षेप में कहा जाए तो कृष्ण योगी भी हैं और भोगी भी छलिया भी हैं और विश्वसनीय भी वह 16 कलाओं से युक्त एक संपूर्ण नायक के रूप में अपने भक्तों को लुभाते हैं तो सुन का विराट स्वरूप दुष्टों को दिलाता है। वें माता यशोदा को अपने मुख में ही तीनों लोगों का दर्शन करा देते हैं तो अर्जुन को विराट स्वरूप से अभिभूत करते हैं। कृष्ण को जितना बांचा जाए उतने ही निर्वाच्य हो जाते हैं। पूर्ण पुरुष पुरातन कृष्ण को दो शब्दों में कहें तो यें दो शब्द हैं नैति - नैति। यदि कृष्ण को स्थूल के बजाय सूक्ष्म रूप में वर्णित किया जाए तो कृष्ण वायवीय हो जाते हैं। वह मन - धर्म, दर्शन, अध्यात्म एवं योग का एक कल्याणकारी संम्मिश्रण दिखते हैं। कृष्ण द्वैत भी हैं एवं अद्वैत भी। वें साकार भी हैं एवं निराकार भी। 

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