शेर की खाल में सियार...

नेपाल हमारा ऐसा पड़ोसी है जिसके साथ हमारे जिस तरह के आर्थिक, समाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक नाते है, हमारे दोनों के बीच जिस तरह की बेरोकटोक आवाजाही है, जिस तरह के रोटी और बेटी के सबंध है, उसके मद्देनजर कोई बाहर का देखने वाला यह नहीं कह सकता कि दोनों अलग-अलग है. यह रिश्ता एक दो दिन का नहीं है ऐतिहासिक है जिसे ओली अपनी सत्ता पिपासा में तार-तार करने पर अमादा दिखाई देते हैं. पहले उन्होंने हमारे उन क्षेत्रों को जिन्हें कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख के नाम से जाना जाता है उसे अपने नक्शे में दिखाने की हिमाकत की, नो मैन जोन में कुछ टेंट वेंट लगाने की कोशिश की, और सदियों से भी ज्यादा पुराने रिश्तों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करने का दुस्साहस किया. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम की जन्म भूमि को भी लेकर आधारहीन, असत्य विधान तक किया और हास्य का पात्र बने. कारण उनके ही देश के नेताओं और अन्य विद्वानों एवं संतों ने उनकी भर्त्सना की. अब उन्होंने अपने नए नक्शे को जिसमें हमारे इलाके को अपना दिखा रहे है, उसका डंका दुनिया में पीटने का इरादा बनाया है, उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे है, यह सब वह अपनी स्वेच्छा से नहीं कर रहे हैं बल्कि दो कारणों से कर रहे हैं, जिसमे पहला, उनकी सत्ता पिपासा है और कुछ भी कर वह सत्ता में बचे रहना चाहते है जो उनकी नादानी है. दूसरा कारण चीन द्वारा उकसाया जाना है चीन को लगता है कि नेपाल को हमारा विरोधी बनाकर वह जिस तरह पाकिस्तान से हमारे खिलाफ काम करवाता रहता है वैसे ही वह नेपाल से भी करवाएगा. इसके लिए वह कूटनीति के हर हथकंडे अपनाता है और वही वह नेपाल के साथ भी अपना रहा है. समझदार नेता चीन के सब्जबाग में आने के पहले पाक की हालत देख लेता, श्रीलंका से सबक लेता, मालदीव से सीख लेता कि कैसे चीन पहले प्यार से खैरात देता हैं फिर जी भर कर कर्ज और फिर कैसे उसे वसूलने के लिए या तो पाक की तरह कठपुतली बनाता है, या श्रीलंका की तरह बंदरगाह पर कब्जा कर लेता है. आपकी जमीन आपका स्वाभिमान सब गटक जाने का प्रयास करता है जो वह नेपाल के साथ भी कर रहा है. परन्तु सत्ता की लालच में अंधे ओली को यह नहीं दिख रहा है चीन के दम पर वह उस सियार जैसी हरकत कर रहे है जिसे जंगल में शेर की खाल मिल जाती है और उसे ओढ़ कर वह कुछ दिने के लिए अपने आपको शेर समझ लेता है परन्तु जब शेर की तरह दहाड़ने की बारी आती है तो वह करने में असमर्थ होता है. उसके गले से सियार की आवाज ही निकलती है और उसका सारा ढोंग उजागर हो जाता है परिणामत: जान भी गवांता है. चीन हमारे पड़ोसियों को सियार से शेर बनाने का काम करता है परंतु वह यह भूल जाता है कि शेर की खाल ओढ़ कर कोई शेर नहीं बनता और जब यह सियार की खाल वाले शेरो का मुकाबला भारत जैसे बब्बर शेर से होता है तो उसकी एक ही दहाड़ उसे उसकी औकात बता देती है. वह दशकों से पाक को चढ़ा रहा है परन्तु हमारी एक ही दहाड़ उसे पानी-पानी कर देती है और उसकी नींद गायब हो जाती है. यही नहीं खुद चीन ने भी अभी लद्दाख में दहाड़ ही सुनी है तो उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम है और इतना दिग्भ्रमित है कि कैसे बाहर जाय और क्या करे? तो नेपाल को इससे ही अंदाजा लगा लेना चाहिए कि शेर की खाल ओढ़कर वह असली शेर का मुकाबला कैसे करेगा? भारत उसे अपना मान कर उसकी नादानियां नजरांदाज कर रहा है तो सिर्फ इसलिए की उसे मालूम है कि नेपाल की अवाम और नेतृत्व का बड़ा वर्ग चीन की असलियत और भारत की अहमियत जानता है. वह ओली को राह पर लाने को प्रयत्नशील है. ओली जल्दी राह पर आयेंगे या पद से जायेंगे. कारण उनकी जनता जान रही है कि चीन का साथ का मतलब जमीन और धन दोनों गंवाना हैं और भारत जैसे सदाबहार दोस्त से निरर्थक पंगा उनके हित में नहीं है. भारत यह जानता है इसलिए ओली के सियार स्वांग का मजा ले रहा है और चीन के साथ उसकी भूमिपिपासा को शांत करने के लिए जो कुछ भी किया जाना चाहिये वह कर रहा है और वह भी आक्रामक तरीके से.

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