यह कैसा आत्मघाती विरोध

हिंदी को लेकर डीएमके नेता कनिमोझी का एक बयान क्या आया, उसमे सुर मिलाने वालों की संख्या बढ़ गयी. किसी को इसमें उत्तर भारत का दबदबा बढ़ाने का प्रयास लगता है तो किसी को कुछ और लगता है. यह सब ऐसे नेताओं को लगता है जिनका परिवार या वे खुद देश में बड़े-बड़े पदों को सुशोभित कर चुके है. इनमें अधिकांश पहनावे और व्यवहार में उस क्षेत्र के प्रतिमूर्ति लगते है, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते है या जहां उनकी जड़ें हैं. इन्हें अंग्रेजी बोलने या सीखने में कोई परेशानी नहीं है परन्तु हिंदी का नाम लेने में इन्हें परेशानी है. इनका अंग्रेजी मोह ही वह कारण है जो न क्षेत्रीय भाषा को पनपने दे रहा है और न ही राष्ट्रभाषा हिंदी को. यह हमारे देश के एक वर्ग को समझ नही आ रहा है कि कई देश ऐसे हैं जहां कई भाषाएँ है परन्तु उन्होंने एक भाषा को सर्वमान्य बनाकर उसे समृद्ध और अद्यतन किया कि जिससे उन्हें अंग्रेजी की बैशाखी की जरूरत नहीं है, परन्तु हम वैसा नहीं कर पा रहे है. कारण हमारे यहाँ उस पर भी राजनीति और क्षेत्रवाद हावी है.
आज प्रतियोगिता का युग है दुनिया की शुरुवात से लेकर अब तक तमाम भाषायें और बोलियां प्रचलन में आयी और जब तक उपयोगी रही चली, नहीं तो लुप्त हो गयी. कारण उनसे व्यक्ति के संप्रेषण व रोजी-रोटी की वह आवश्यकताएं नहीं पूरी हुई जिसकी उसे दरकार थी. अंग्रेजी को इसीलिए ज्यादा महत्व का स्थान, आज हमारे देश के कोने कोने में है, क्योंकि हमने अपनी क्षेत्रीय भाषाओं का क्षेत्रीय स्तर पर और राष्ट्रीय भाषा का राष्ट्रीय स्तर पर वैसा विकास नहीं किया जो अंग्रेजी का स्थान ले ले. इसके लिए जितना जरूरी था उतनी इमानदार कोशिश हमने अखिल भारतीय स्तर पर नहीं की. जिसे क्षेत्रिय भाषाओं का उनके क्षेत्र में विकास हो सकें और देश में सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा हिन्दी का वैसा विकास हो सके कि वह देश में संपर्क और रोजगार की भाषा के रूप में अंग्रेजी का स्थान ले सके. अंग्रेजी की दीवानगी दोनों स्तर पर हमारे सर पर हावी है और क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर हमारी भाषाओं का प्रसार रोक रही है. हम इसका प्रतिकार करने की नहीं सोच रहे है बल्कि हिंदी का विरोध कर रह है. यह नादानी और तुच्छ राजनीति है. अंग्रेजी की पूजा कर और हिंदी का विरोध कर अंग्रेजी को जिंदा रख कर हम अपनी ही भाषाओं को मिटाने का प्रयास कर रहे हैं. भाषा चाहे वह जिस क्षेत्र या देश की हो वह उसकी संस्कृति, उसके संस्कारों की संवाहक होती है. उसको
एक पीढी सेदूसरे पीढी को संप्रेषित करती है. यदि वह प्रभावित होगी तो समाज भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. हमारे देश में यही हो रहा है अपनी क्षेत्रीय भाषा या राष्ट्रीय भाषा का प्रकांड पंडित भी अंग्रेजी दां के सामने अपने आपको आत्महीनता के सागर में गोते लगाते पाता है, जबकि अंग्रेजी का जानकार सम्मान पाता है. हमें इस सोच और धारणा को बदलना होगा. इसके लिए अपने आपको बदलना होगा, क्षेत्रीय भाषाओं और देश की भाषा को इस तरह विकसित करना होगा व इस तरह उन्हें अपने दैनिक प्रयोग में लाना होगा कि वह अंग्रेजी का स्थान ले सके. जो हिंदी का विरोध करने से नहीं होगा. हिंदी का विरोध और अंग्रजी का गुणगान करने से क्षेत्रीय भाषा बढ़ेगी, जो ऐसा सोचते हैं वह दिग़भ्रमित है. जिस तेजी से देशव्यापी विस्तार अंग्रेजी शिक्षा को मिल रहा है, क्षेत्रीय माध्यम वाले स्कूल कम हो रहे है, वह आँख खोलने के लिए काफी है. हिंदी बढ़ रही है और उन राज्यों में भी बढ़ रही है, जहां उसका विरोध करने वाले नेता है. तो इसका कारण यह है कि देश में अंग्रेजी के बाद रोजी-रोटी का साधन उपलब्ध कराने और लोगों को संपर्क में लाने के लिए दूसरा सबसे बड़ा माध्यम हिन्दी है. जिसमें यह क्षमता है उसे आगे बढ़ने से कोई भी विरोध रोक नहीं सकता. इसलिए यह नेता अपनी क्षेत्रीय भाषा का खूब विकास करें, लेकिन उसके साथ हिंदी को इस तरह अपनाएं जिस तरह आज अंग्रजी को अपनाते है. कारण हिंदी देश की भाषा है, उसमे देश के संस्कार और संस्कृति की गूँज है. दोनों को अपनाना दोनों को समृद्ध करेगा. परन्तु अंग्रेजी प्रेम क्षेत्रीय भाषाओं और हिन्दी दोनों का नुकसान कर रहा है. कुछ का जल्दी होगा और कुछ का थोड़ा समय में होगा. इसलिए अपने ही देश की भाषा का विरोध करने का और अंग्रेजी दां बनने का आत्मघाती ढोंग बंद होना चाहिए. इससे क्षेत्रीय भाषा और हिंदी दोनों का भला होगा और देश का भी भला होगा.

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