कार्यकर्ता रोबोट या कठपुतली नही

कांग्रेस नेता खुसबू का यह वक्तव्य कि वे रोबोट या कठपुतली नहीं हैं. उनका मानना कि जो बात देश या पार्टी के हित में है, वह पार्टी के सर्वोच्च नेता को न जंच रही हो, तो भी उसे कहने में संकोच नहीं करना चाहिए. उसे पार्टी या नेता का विरोध नही माना जाना चाहिये, बल्कि उस पर विचार करना चाहिए. जिस तरह कांग्रेस में नयी और पुरानी पीढ़ी की लाग-डांट रही है, पार्टी को इस बात पर गौर करना निहायत जरूरी है. कारण कांग्रेस ने अपने लम्बे शासन काल में जिस तरह की राजनीति की और पार्टी तथा सत्ता संचालन की पद्धति विकसित की, कायदे बनाये उन पर अब जबकि पहली बार उसके विपरीत क्रियाकलाप समाने आ रहे है, तो उसपर सवाल उठना लाजिमी है. देश के कई मुद्दे ऐसे हैं जिनका समाधान कांग्रेस की दृष्टि से या तो असंभव था, या बहुत मुश्किल था. अल्पसंख्यक मतों के वगैर कोई दल देश में सत्ता में नहीं आ सकता. यह मिथक भी टूटा है, कांग्रेस ने इन्हें अपने पाले में बरकरार रखने के लिए ना जाने कितने पापड़ बेले, ना जाने क्या-क्या किया और कर रही है. परन्तु आज न ये पूरी तरह उसके साथ है और न कोई अन्य तबका. उलटा कांग्रेस की देश की बहुसंख्यक समुदाय विरोधी छवि बन गयी है. अभी भी उसके नेता पार्टी का वहीं रटा-रटाया विचार, भूमिका दुहरा रहे हैं, जो उसका अब तक चरित्र था. स्वाभाविक है कि उसका आम आवाम के लिए कोई आकर्षण नहीं बचा है. राहुल गांधी और कांग्रेस के नेता भाजपा सरकार की आलोचना तो करते है, परन्तु उस आलोचना का कोई विकल्प देने में अक्षम हैं. उदाहरण के लिए वायु सेना रफाल जैसी जेट की 2001 मेें मांग कर रही थी, 2014 तक कांग्रेस ने समय बिताया और कुछ नहीं हुआ. जब मौजूदा भाजपा सरकार ने इसे लाने का कार्य शुरू किया और डील हुई, तो कांग्रेस को इसमेें भ्रष्टाचार, और न जाने क्या-क्या नजर आने लगा. मामला उच्चतम न्यायालय तक गया. सब कुछ साफ हुआ, आज रफाल आ चुका है. फिर भी कांग्रेस अभी भी उस पर वही राग अलाप रही है जो खारिज हो चुकी है. ऐसे उद्गार उसके मुद्दों के दिवालियेपन और नयी सोंच की कमी दर्शाते है. यह प्रकारान्तर से उसका ही भट्टा बिठा रही है. यह लोग जो सबसे बड़ी चूक कर रहे है, वह यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पुरानी गैर कांग्रेसी सरकारों की तरह देख रहे है. पहली सरकारें अटलजी को छोड़ कर सभी ऐसे नेताओं के नेतृत्व में थी जो पूर्व में कांग्रेसी थे. जबकि अटलजी की सरकार गठबन्धन सरकार थी. पिछले छह साल से भाजपा अपने दम पर साा में है, और उसने भाजपा के एजेंडे को लागू करना आक्रामक रूप से शुरू किया है. जिसके तहत ऐसे मुद्दों पर काम हुआ है जो कांग्रेस के लिए असोचनीय था. अब वह सब इतिहास में स्वर्णांकित हैैं और देश की सरकार और उसके मुखिया नरेंद्र मोदी के शौर्य का प्रतीक है. स्वाभाविक है कि इससे पूरी कांग्रेस पर कई मुद्दों पर उनकी पार्टी द्वारा अब तक अपनाई गयी नीतियों को लेकर सवाल खड़ा किया जा रहा है कि यदि भाजपा के शासनकाल में ऐसा हो सकता है, तो हमारी पूर्व की कांग्रेस सरकारों ने ऐसा क्यों नहीं किया. आज जब हम जनता के सामने जाएं तो इन कमियों का कैसे सामना करें, यूपीए-2 की नीतिगत कमियों या पक्षाघात का कैसे सामना करें. उस दौरान मिले भ्रष्टाचार के तमगे से पार्टी को कैसे उबारें. कार्यकर्ताओं और नेताओं को इन सवालों का जबाब देने की बजाय, उन्हें घुटन से निकाल काम पर लगाने की बजाय, कांग्रेस उन पर जाबा लगा रही है. जिसका परिणाम है कि वे जब बर्दाश्त नहीं कर पाते तो अपनी भड़ास खुल कर निकालते है, या पार्टी को टाटा कह रहे है. कांग्रेस नेतृत्व को यदि बचना है और पार्टी को बचाना है तो इस पर ध्यान देना होगा. कार्यकर्ता रोबोट नहीं विचारवान प्राणी है, उसे उसके सवालों का जबाब चाहिए. नहीं तो पार्टी का सूरज तेजी से अस्ताचल की और जा रहा है. प्राकृतिक सूर्य का उदय होना तय है परंतु कांग्रेस का सूर्य पुन: उदित होगा इस पर संदेह लगातार बढ़ता जा रहा है.

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