लोगों में गंडक का पसरा डर

पूर्वी चंपारण
पूर्वी चंपारण की एक बड़ी आबादी चार माह तक ठीक से सो नहीं पाती है। कारण बाढ़। साल के आठ महीने गंडक नारायणी जीवनदायिनी बनकर समृद्धि की कहानी गढ़ती है तो चार महीने विनाश की दास्तान पेश करती है। ये चार महीने पूरे साल पर भारी पड़ती है। ये चार महीने आंखों में खौफ लिए कटती है। रात को न तो नींद आती है और न दिन को चैन मिलता है। पूर्वी चम्पारण में करीब पचास किलोमीटर से अधिक लंबी गंडक नदी जब अपनी रवानी में आने लगती है तो यहां के लोग सहम जाते हैं।
गंडक नदी के किनारे बसीं मननपुर की रिंकू देवी बताती हैं कि अमूमन हर साल बाढ़ का दंश झेलना पड़ता है। कहां जाएं, किधर जाएं..., कुछ समझ में नहीं आता। माल-मवेशी व बच्चों को एक साथ कहीं ले जाना मुश्किल है। इसलिए किसी प्रकार ये चार महीने खौफ के साये में रहकर काटने ही पड़ते हैं। बाढ़ गुजर जाने के बाद कभी जमीन उपजाऊं हो जाती है तो कभी रेत बन जाती है। यहीं धूप-छांव झेलते जिंदगी कट जाएगी। ध्रुप प्रसाद, कन्हैया जी, विजेंद्र, लालबाबू कहते हैं-साहब, गंडक की तो अपनी नियति है मगर हाकिम लोग भी कम जिम्मेदार नहीं है। सालभर सुनते हैं कि बांध मरम्मत चल रहा है, मगर यहां कहां होता है यह पता नहीं चलता। देख लीजिए बांध की हालत सबकुछ समझ में आ जाएगा। डर इसलिए नहीं लगता गंडक में पानी आया है, डर इसलिए लगता है कि यह बांध कहीं भी और कभी भी टूट सकता है।

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