यह स्थिति ठीक नही

 देश में वह चाहे उत्तर प्रदेश हो या बिहार महाराष्ट्र हो या अन्य कोई प्रदेश, पुलिस महकमे को लेकर काफी आलोचना हो रही है. कानपुर मामले में पुलिस की संदिग्ध भूमिका का कितना विद्रूप रूप समाने आया यह सबने देखा है. अब बलरामपुर में एक आतंकी बर्बादी के जखीरे के साथ पकड़ा गया है. यही नहीं जिस महाराष्ट्र पुलिस का, और विशेषकर मुंबई पुलिस का देश और दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान है. एक जमाना था जब इसकी तुलना स्कॉटलैंड यार्ड की पुलिस से की जाती थी. आज उसे लेकर भी तरह-तरह के नकारात्मक सवाल मीडिया में किये जा रहे है. मुंबई महानगर में जहां इतनी बड़ी आबादी रहती है, उसकी कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त रखना एक बड़ी चुनौती है. यह चुनौती उस समय और बड़ी हो जाती है जब हम मुंबई के उस स्वरूप को ध्यान में रख कर उसका मूल्यांकन करते है, वह स्वरूप है इसका भारत की सच्ची झांकी प्रस्तुत करना. शायद ही देश का कोई राज्य ऐसा होगा जिसका यहाँ अच्छा खासा प्रतिनिधित्व ना हो. मुंबई ऐसा स्थान है जहां देश की विभिन्नता में एकता का सूत्र चरितार्थ होता है. तो इसकी समस्याएँ भी बड़ी है. कारण यह देश और दुनिया की संस्कृतियों का संगम स्थल है. जहाँ कानून व्यवस्था को चाक चौबंद रखने का काम मुंबई पुलिस ने अच्छी तरह किया है, चाहे अपराधियों की टोलियों से निपटने की बात हो, आतंकी हमलों का सामना और उनका पर्दाफाश करने की बात हो, मुंबई पुलिस कभी पीछे नहीं रही. उसी पुलिस पर आज सुशांत सिंह आत्महत्या प्रकरण को लेकर और पालघर में संतों पर हमले को लेकर चारों तरफ से प्रहार हो रहे है. जहां तक सुशांत सिंह का मामला है उसकी जांच सीबीआई को सुपुर्द हो चुकी है और संतों के मामले में भी उसकी मांग हो रही है. इन सब बातों के बीच जो बात महत्वपूर्ण है वह यह है कि उक्त सारे घटना क्रम मुबई पुलिस की छवि पर तरह-तरह के प्रश्न चिन्ह खड़े कर रहे हैं. देश में कई अभियान चले कि पुलिस महकमे का काम सही तरीके से हो, लेकिन अभी तक वैसी सफलता नहीं मिल पायी. राजनैतिक हस्तक्षेप, कदाचार और विभाग में ही ऐसी काली बिल्लियों का होना जिनका आपस में इन तत्वों से साठ-गांठ हो. स्थिति में सुधार काफी चुनौती पूर्ण बनाता है, कानपुर का विकास दुबे प्रकरण इसका जीता-जागता प्रमाण है. यही नहीं बलरामपुर में आतंकी के पकडे जाने के बाद भी पुलिस पर उंगलियाँ उठ रही है कि वह व्यक्ति दो साल से संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त था, और पुलिस को या स्थानीय खुफ़िया विभाग को इसकी कानों-कान खबर तक नहीं लगी. ऐसी सभी बातें उस महकमे के लिए ठीक नहीं है जिस पर आम-अवाम की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, जो अपने क्षेत्र की शांति और सुव्यवस्था सुनिश्चित करता है. माना कि समर्पित और कर्तव्य दक्ष अधिकारियों की और पुलिस कर्मियों की कमी नहीं है, साथ ही यह भी उतना ही सच है कि कुछ ऐसे भी है जो अपने कार्यों से अपने व्यवसाय की शुचिता को कलंकित करते है. कहावत भी है कि 'एक गन्दी मछली सारे तालाब को गन्दा करती है'. आवश्यक है इस तथ्य को ध्यान में रख कर देश और राज्यों के नीतिनियंता और इस महकमे के आला अधिकारी मिल बैठकर कुछ ऐसा मैकेनिज्म विकसित करे कि विभाग को ऐसी आवांछनीय आलोचनाओं से दो चार ना होना पड़े. महकमा की छवि और उसके कार्य दोनों बेदाग़ हों और देश के कोने-कोने में शांति और कानून का राज कायम हो. यह न हो कि वेतन सरकार से लें, और सुने किसी अपराधी की, या अपराध होता हुआ देख कर मूकदर्शक बने रहने का आरोप झेलें, जैसे पालघर, (महाराष्ट्र) में हुआ.

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