इसे राजनीति का अखाड़ा न बनाएं

देश में कोई बात हो और उस पर राजनीति न हो तो वह किसी अजूबे से कम नहीं होगा. आज-कल नीट और जेईई परीक्षा को लेकर माहौल गर्म है. देश और दुनिया के सैकड़ों से ज्यादा शिक्षाविद प्रधानमन्त्री को पत्र लिख कर यह जता चुके हैं कि परीक्षा होनी कितनी जरूरी है?
इसमें ज्यादा देरी हुई तो शून्य सत्र हो सकता है. बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके और उक्त परीक्षा की तैयारी कर चुके छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ हो सकता है, शिक्षाविद ऐसी चेतावनियां भी दे रहे हैैं, लेकिन सोनिया गाँधी की अगुवाई में विपक्षी मुख्यमंत्रियों का समूह इसे लेकर आक्रामक है. वह इस मुद्दे को लेकर न्यायालय के दरवाज़े पर दस्तक तक देने की बात कर रहा है. राजनीति ने शिक्षा का कितना नुकसान किया है इसका हम सब को अंदाजा है. कभी कोई, युवा मत लुभाने के लिए अग्रेजी पढ़ाना बंद कर देता है, कोई आरक्षण की बलि बेदी पर गुणवताा का हवन होना ही अपना मुख्य मकसद मानता है. अपनी-अपनी छात्र इकाइयों के माध्यम से कैंपस को राजनीति का अखाड़ा बनाने की कहानी और उसके दुष्प्रभाव से पूरा देश वाकिब है. जेएनयु से लेकर जामिया तक और वहां से लेकर अलीगढ़ तक हमने तमाम घटनाक्रम देखे है. साथ ही वहां कैसी पढ़ाई हो रही है इसे लेकर सर भी पीटा है लेकिन राजनीति इससे कोई सबक नहीं ले रही. उनका मकसद जैसा हर मामले में होता है सिर्फ और सिर्फ अधिकतम वोट प्राप्त करना है. परीक्षा के मुद्दे पर कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष मुद्दों से दिवालिया जैसा व्यवहार कर रहा है. उन्होंने अकेले और मिलकर सब कर के देख लिया. प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी नीति सरकार और भाजपा की लोकप्रियता पर कोई फर्क नहीं पड रहा है. तो अब छात्रों के भविष्य साथ खिलवाड़ करने वाला नया मुद्दा सामने आ गया है. ज्यादातर अभिभावक और छात्र परीक्षा चाहते है. उनका प्रवेश कितनी जल्दी हो इसकी बाट जोह रहे है लेकिन इससे इनको क्या लेना. कारण ऐसे भी छात्र है जो इनके झांसे में आ जाते है और अपना मूल्यवान समय गवां देते है. यह महामारी का काल है तो जैसे उससे सबंधित सावधानियां बरत कर और कार्य हो रहे है, तो परीक्षा भी संपादित हो सकती है. बिना परीक्षा उतीर्ण करने का मामला भी विवाद में है. कई विद्वानों का यह मत है कि ऐसे उत्तीर्ण छात्रों कोविड बैच के नाम से जाने जायेंगे और आगे चल कर कैरियर में उन्हें काफी दिक्कत का समान करना पड़ सकता है. यह समझा जा सकता है कि सभी दलों को छात्रों के स्वास्थ्य की चिंता है. यह चिंता असल में है, ऐसा लगता नहीं. इसमें असली मकसद तो अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का लगता है. विपक्ष द्वारा अपनी मुद्दाविहीनता को छिपाने के लिए और सरकार को घेरने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाना अशोभनीय है और वह उसे निंदा का पात्र बनाता है.
इसलिए छात्रों के स्वास्थ्य की चिंता का ढोंग बंद कर इन्हें वैसा करने में अपना सहयोग देना चाहिये जैसा अभिभावक व छात्र चाहते है और जैसी सलाह शिक्षाविद् दे रहे है. क्योंकि अच्छा स्वास्थ्य और अच्छा भविष्य दोनों जरूरी है. छात्रों का साल भी बचा रहे और उनका स्वास्थ्य भी ठीक रहे इस तरह से सोचना होगा. राजनीति पहले ही हमारी शिक्षा व्यवस्था का काफी नुकसान कर चुकी है. इन दलों ने अपने-अपनेे छात्र संस्थानों के माफ़र्त उनके बीच घुसपैठ करके जिस मकसद से छात्र संगठन शुरू किये गये थे, उसे ही मटियामेट कर दिया है. कम से कम अब सद्बुद्धि का परिचय दें और विशुद्ध रूप से इस अकादमिक कार्य को उन्ही लोगों पर छोड़ें जो इसके लिए पात्र है. हर काम में टांग अड़ाकर उसे विद्रूप करना सही नहीं है. विपक्ष की भूमिका प्रजातंत्र में रचनात्मक होती है इसका भी ध्यान विपक्ष को रखना चाहिए.

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