कांग्रेस की जमींदारों वाली सोंच

राकांपा प्रमुख शरद पवार ने जब 1999 में कांग्रेस से बगावत कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना की थी. उस समय कांग्रेस की स्थिति का चित्रण करते हुए उन्होंने कहा था कि आज कांग्रेस की स्थिति उन पुराने जमींदारों जैसी है जिनकी जमींदारी तो जा चुकी है, उनकी हवेली ढह रही है और उसकी मरम्मत करने में अक्षम है, ऐसी दशा में भी जब वे आज अपनी हवेली के परकोटे पर खड़े होते हैं और अपने इलाके पर दृष्टि-पात करते है तो उन्हें सारा इलाका अपना लगता है. तब से लगभग दो दशक बीत चुके है. इस दौरान कांग्रेस मनमोहन सिंह के नेतृत्व में 10 बरस सत्ता में भी रही, भले बैशाखियों के बलबूते रही हो. शरद पवार ने यह भी कहा था कि कांग्रेस कार्य समिति में आधे से ज्यादा सदस्य पुराने नौकरशाह है, बाकी में से आधे ऐसे है जिन्होंने लम्बे समय से कोई चुनाव नहीं लड़ा. ऐसे लोग पार्टी कार्यकर्ताओं, उम्मीदवारों को जीत का पहाड़ा पढ़ाते है. 1999 से 2020 तक काफी लंबा अंतराल बीत चुका है, पवार की उक्त टिप्पणियाँ तब जितनी सटीक थी आज भी उतनी ही सामयिक और प्रासांगिक है. कांग्रेस ने इस लम्बे काल खंड में कुछ नहीं सीखा, यही कारण है कि दस साल सत्ता में रहने के बावजूद उसकी 2014 में करारी हार हुई. यह हार इतनी भीषण और ऐतिहासिक रही कि उसे नेता प्रतिपक्ष का पद भी नसीब नहीं हुआ और वही स्थिति 2019 में भी दुहराई गयी. स्वाभाविक है कि इस स्थिति से सत्ता को अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानने वाले कांग्रेसजनों और परिवार की माला जप कर बड़े नेता का स्वांग भरने वाले और माल काटने वाले नेताओं में बेचैनी व्याप्त है. यह बेचैनी तब और बढ़ जाती है जब पार्टी का ट्रम्प कार्ड रहा, गांधी परिवार का जादू जनता पर एकदम नहीं चल रहा है. ऐसे में आवश्यकता पुराने तौर-तरीके बदलने की है. चाटुकार जय बोल सकते है परिणाम नहीं दे सकते. इन चाटुकारों की सलाह मान कर पार्टी ने धरातल पर सक्रिय जनाधार वाले नेताओं की अवहेलाना और अनदेखी की, उनका अपमान किया गया, उसी का परिणाम है कि आज पार्टी शिखर से शून्य पर पहुँच गयी है. जमींदारी और जमींदार अतीत की कहानी हो गए है. आज का दौर बदल चुका है लेकिन कांग्रेस अभी भी आला कमान को उसी तरह प्रदर्शित कर रही है जैसा पुराने राजाओं और जमीदारों के दौर में होता था, कि बिना उनकी अनुमति के पत्ता भी नहीं हिलता था.
जैसा कि 23 नेताओं के कांग्रेस अध्यक्ष को लिखे पत्र और उसके बाद हुए कांग्रेस कार्य समित के ड्रामे और उसकी पार्टी में दो फाड़ होने और उसके बाद आला कमान गुट के भारी पड़ने और यथास्थित बरक़रार रहने से स्पष्ट है कि कांग्रेस आला कमान को अभी भी यह विश्वास है कि वह पुरानी रीति-नीति और शैली से पार्टी की गाड़ी चला लेगी तो फिर उसका भी वही हश्र होना तय है जो जमींदारों का हुआ. वह चाहे पार्टी हो या सोच उसे बदलते हुए समय और सोच के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है. कांग्रेस बाकी सब कर रही है परन्तु वह नहीं कर रही है जो करना सबसे जरूरी है. वह है उसकी रीति-नीति की शैली में आमूल चूल परिवर्तन. उसे नए युग की मांग के अनुसार ढालने की जरुरत है, जिसका मतलब पार्टी में आतंरिक प्रजातंत्र को बढ़ावा देना, जिससे असंतुष्ट भी अपनी बात पार्टी फोरम में खुले दिल से कह सकें ऐसा माहौल बनाना और उसे विद्रोह ना समझा जाना. साथ ही चाटुकारों की बजाय ऐसे लोगों को
ज्यादा तवज्जो देना जो देश के मौजूदा परिदृश्य के अनुसार पार्टी की कमोजोरियां समझते है, और उसे दूर करने का उपाय सुझा सकते है. आला कमान के सामने उसे अप्रिय लगने वाली बाते भी कर सकते है. आला कमान को अब जमींदार की तरह नहीं बल्कि एक प्रजातांत्रिक पार्टी के मुखियां की तरह प्रजतांत्रिक तौर तरीके से पार्टी को चलाना होगा नहीं तो जिस तरह वह चल रही है उसका भविष्य लंबा चलेगा ऐसा नहीं लगता.

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