सही कदम उठें तो सकारात्मक बदलाव हो सकता है

उत्तर प्रदेश और बिहार देश के दो बड़े सूबे जो देश की गंगा-जमुनी संस्कृति के जन्मस्थल हैं. बिहार में नितीश के पूर्व के कार्यकाल में और उत्तरप्रदेश में योगी के पूर्व के कार्यकाल में जिस तरह जातिवादी, परिवारवादी, अपराध ग्रस्त और भ्रष्ट राजनीति का बोलबाला रहा, जो लगभग तीन दशक लम्बे कार्यकाल तक बना रहा. उसी का प्रतिफल है कि दोनों राज्यों के लोग रोजी-रोटी की आस में पूरे देश में भटकते रहे है. कहीं प्यार तो कहीं तिरस्कार झेलते रहे, ये राज्य उपजाऊ जमीन और पानी की सहज उपलब्धता के नाते कुछ हिस्सों को छोड़ दो तो ज्यादातर इलाके कृषि के लिए काफी मुफीद है. लेकिन बढ़ती आबादी और अन्य कारणों से कितना मनुष्य बल खेती में खप सकता है, इसकी एक मर्यादा है. उपरोक्त राजनीति के पुरोधाओं ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया. कारण जाति और अपराध का संगम व भ्रष्टाचार के आलावा सत्ता पाने का कोई तरीका उनके पास था ही नहीं. जनता भी इसे अपनी नियति मान चुकी थी. बिहार की इस अराजक स्थिति से मुक्ति मिली, नितीश के रूप में जब उन्होंने शासन कैसे किया जा सकता है? यह करके दिखाया. इसका श्रेय भी उन्हें चुनाव-दर-चुनाव विजय के रूप में मिल रहा है. जिसके साथ वह जा रहे है वह जीतने वाला गठबंधन बन जाता है. आज बिहार में हर क्षेत्र में इस तरह काम हो रहे है जो उनके पहले के दशकों में बिहार को लेकर कोई सोंच भी नहीं सकता था. यही हाल उत्तर प्रदेश का है, योगी युग में अभूतपूर्व बात हो रही है, जहां से निवेशक भागते थे, अब उस यूपी में व्यापार और निवेश करने के लिए वे दौड़ लगा रहे हैं. आज उटार प्रदेश निवेश के लिए देश की सर्वोत्तम जगहों में से एक हो गया है. रस्ते, गली, कूचे जिस पर किसी भी निजाम का, योगी के पहले दशकों ध्यान नही गया, अब चकाचक हो रहे हैं. शहरों का चेहरा-मोहरा बदल रहा है, पर्यटन का विकास शिखर पर है. यह अनायस ही नहीं है कि मंगलवार को प्रधान मंत्री बिहार में यह कह रहे थे कि कुछ लोगों की राजनीति ने इन राज्यों की नियति ही गरीब-बीमारू बना दी थी, यह काफी विचारणीय है. इनमें से कई का मकसद, सिर्फ और सिर्फ उनका वोट बैंक कैसे मजबूत रहे? वे सत्ता बैठकर अपना, अपने परिवार और अपने चमचे-चाटुकारों के साथ माल काटते रहें. यही उनका ध्येय था. राज्य का समग्र विकास हो, वह इस मानक पर देश का अगुवा बने, लोगों को हर तरह की प्राथमिक सुविधाएं सहज व सुलभ हो, यह सोचने की किसी को फुर्सत नहीं थी. यदि आप बाहुबली हैं, दबंग है, कई अपराध किये है, आप पर मुकदमे चल रहे है परंतु सजायाफ्ता मुजरिम नहीं है तो तुरन्त नेता बन सकते है. यह सफेदपोश लोग अपने आतंक और गलत करोबार के बल पर लोगों पर अत्याचार करते थे, सरकारी या गैर सरकारी जमीन हड़पते थे, उन पर घर बनाते थे और न जाने क्या-क्या करते थे. यही नहीं इनके परिवार के लोग भी इसमे लिप्त रहते थे. आज-कल योगी राज में ऐसे सफेदपोशों के खिलाफ मुहिम उफान पर है. एक-एक की कलई खुल रही है. यह आज नहीं दशकों से अपना असामाजिक कार्य करते आये है, लेकिन किसी भी दूसरे निजाम ने इन पर लगाम लगाने की हिम्मत नहीं दिखाई. जबकि योगिराज में हर ओर नजर है, और जिसका असर भी राज्य में दिख रहा है. यह इसलिए हो रहा है कि इन दोनों नेताओं ने अपने काम के बलबूते सत्ता में बने रहने का निश्चय किया. सत्ता पाकर सिर्फ अपने ही भले का ध्यान नहीं रखा बल्कि इनकी, समग्र राज्य को लेकर एक सोच और दूरदृष्टि है, जिसके तहत ये वहां विकास का, शांति, सुव्यवस्था और कानून का राज स्थापित करना चाहते हैं, और कर भी रहे है. इसमें अड़चने भी आयेंगी, कारण ऐसे तत्व जिन्होंने दशकों से ऐसे दलों और सफेदपोश नेताओं की छत्रछाया में लम्बे समय से माल काटा है, वे व्यवधान भी खड़ा करेंगे. यह इनके साथ भी हो रहा है परंतु इससे विचलित न होकर जिस तरह यह राज्य का और प्रकरांतर से देश के कायाकल्प में अपना योगदान दे रहे हैं, वह जताता है कि यदि पूरे राज्य का विचार कर, शासन का संचालन किया जाय, कमियों को दूर किया जाय, कानून का राज कायम किया जाय और ऐसे लोगों को उनकी औकात दिखायी जाय जो अपने कर्मों से विकास को बाधित करते है और समाज की शांति और सुव्यवस्था को प्रभावित करते है. तो यह दोनों राज्य भी देश के विकास पथ में अपनी यथोचित भूमिका निभा सकते हैं और बीमारू या गरीब राज्य के उपनाम से बाहर आ सकते है और यही हो रहा है अब किसी जाति विशेष के लिए नहीं बल्कि राज्य के जन-जन के लिए काम हो रहा है. राज्य का समग्र विकास हो यह सुनिश्चित करने का ईमानदारी से प्रयास हो रहा है. इस सकारात्मकता की जनता को पहचान चाहिए. समग्रता में ही विचार करना चाहिए, जाति और अपराधी पृष्ठभूमि को महत्व नहीं दे, बल्कि ऐसे दल और नेता को महत्व दें जो सही तरीके से राज्य का बहुमुखी विकास कर सकता है जो नितीश और योगी युग में हो रहा है.

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